Gita Acharan

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By: Siva Prasad

Bhagavad Gita is a conversation between Lord Krishna and Warrior Arjun. The Gita is Lord's guidance to humanity to be joyful and attain moksha (salvation) which is the ultimate freedom from all the polarities of the physical world. He shows many paths which can be adopted based on one's nature and conditioning. This podcast is an attempt to interpret the Gita using the context of present times. Siva Prasad is an Indian Administrative Service (IAS) officer. This podcast is the result of understanding the Gita by observing self and lives of people for more than 25 years, being in public life.

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239. कर्ता और कर्म के तीन प्रकार
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#239
Today at 9:18 AM

कर्ता और कर्म को समझना जीवन के सबसे जटिल विषयों में से एक है। भगवद्गीता में इन जटिलताओं की व्याख्या कई स्थानों पर की गई है। श्रीकृष्ण चेतावनी देते हैं कि कर्म और अकर्म (निष्क्रियता) की सूक्ष्मताओं से ज्ञानीजन भी भ्रमित हो जाते हैं (4.16)। श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि सृजन में सक्षम ब्रह्मांडीय ऊर्जा का पृथक्करण (बलिदान) (भूत-भाव-उद्भव-करो विसर्गः) कर्म कहलाता है (8.3) जो स्वयं में एक और गूढ़ विषय है। नियत कर्म भी भ्रम काएक कारण है। इसका समाधान बताते हुए श्रीकृष्ण कर्म करते हुए आन्तरिक समत्व बनाए रखने का मार्ग प्रस्तुत करते हैं। वे हमें ज्ञान की तलवार से संशयों का छेदन करने (4.41) तथा अनासक्ति की कुल्हाड़ी से गहरी जड़ें जमा चुके आसक्तियों को काटने (15.3) का उपदेश देते हैं।गुणों के आधार पर कर्म, कर्ता और ज्ञान -इन तीनों के तीन-तीन प्रकार बताने के बाद, श्रीकृष्ण कर्म के विषय में विस्तार से कहते हैं कि “राग और द्वेष से रहित तथा फल की इच्छा के बिना किया गया नियत कर्म सात्विक कर्म कहलाता है (18.23)। जो कर्म इच्छाओं की पूर्ति की लालसा से प्रेरित होकर अथवा अहंकार के साथ और अत्यधिक परिश्रम से किया जाता है, उसे राजसिक कर्म कहा गया है (18.24)। जो कर्म मोहवश प्रारम्भ किया गया हो, जिसमें अपनी सामर्थ्य पर विचार न किया गया हो, और जिसके परिणाम, हानि या दूसरों को होने वाले कष्ट की कोई परवाह न की गई हो, वह तामसिक कर्म कहलाता है” (18.25)।श्रीकृष्ण कर्ता को भी तीन प्रकारों में विभाजित करते हुए कहते हैं “जोकर्ता आसक्ति और अहंकार से रहित हो, उत्साह और दृढ़ निश्चय सेयुक्त हो, तथा सिद्धि-असिद्धि (सफलता-असफलता) में समभाव रखता हो, वह सात्त्विक कर्ता कहलाता है (18.26)। जो कर्ता कर्मफल की लालसा से प्रेरित होकर लोभी, हिंसक, अशुद्ध, तथा सुख-दुःख से प्रभावित रहता है, वह राजसिक कर्ता कहलाता है (18.27)। जो कर्ता अनुशासनहीन, अशिष्ट, हठी, कपटी, आलसी, उदास तथा कार्यों को टालने वाला है, वह तामसिक कर्ता कहलाता है” (18.28)।किसी भी समय जिस गुण का प्रभाव प्रमुख होता है, उसी के अनुसार कर्म और कर्ता -दोनों का स्वभाव भी बदल जाता है।


238. विचार से कर्म तक
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#238
Last Sunday at 6:15 PM

जब हम (ज्ञाता) किसी फूल (ज्ञान के विषय) को देखते हैं तो हम उसके रंग और सुगंध (ज्ञान) सहित अनेक गुणों को ग्रहण करते हैं। यह स्थिति एक कर्म को प्रेरित करती है। उदाहरण के लिए कोई कवि उस फूल की सुंदरता का वर्णन करते हुए कविता लिख सकता है। कवि कर्ता है, कलम उसका साधन(उपकरण) है, और कविता लिखना उसका कर्म है। इसी प्रकार कोई भक्त उसफूल को अपने इष्ट देवता को अर्पित करने के लिए तोड़ सकता है;कोई प्रेमी उसी फूल को अपने प्रियजन को देने के लिए तोड़ सकताहै; और कोई वनस्पतिशास्त्री (Botanist) उस फूल की प्रकृति का अध्ययन करने में जुट जाता है।इस संबंध में श्रीकृष्ण कहते हैं “ज्ञान, ज्ञेय (ज्ञान का विषय) और ज्ञाता -ये तीन तत्व कर्म को प्रेरित करते हैं। कर्म के उपकरण, स्वयं कर्म और कर्ता-ये तीन कर्म के घटक हैं” (18.18)। अर्थात् प्रत्येक कर्म की उत्पत्ति पहले मानसिक स्तर पर होती है और उसके पश्चात् वह भौतिक स्तर पर प्रकट होता है।गीता के प्रारम्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं मनुष्य को केवल अपने कर्म करने का अधिकार है परंतु उनके फल (कर्मफल) पर उसका अधिकार नहीं है। आगे चलकर वे समझाते हैं कि दैवम् (दैवी इच्छा या अस्तित्व की इच्छा) भी किसी कर्म के फल के लिए उत्तरदायी कारकों में से एक है। यह तथ्य इस बात को दर्शाता है कि परिणामों को प्रभावित करने वाली एक ऐसी शक्ति भी है जो हमारे नियंत्रण से परे है। इसी संदर्भ में श्रीकृष्ण एक अन्य श्लोक में बताते हैं कि कर्म को प्रेरित करने वाले तीन प्रमुख तत्व हैं। जैसा कि पहले पुष्प के उदाहरण से स्पष्ट किया गया, ज्ञाता द्वारा किसी वस्तु के संबंध में प्राप्त ज्ञान अत्यन्त व्यक्तिनिष्ठ होता है। यही व्यक्तिनिष्ठता बताती है कि एक ही परिस्थिति में विभिन्न व्यक्ति अलग-अलग प्रकार की प्रेरणा प्राप्त करते हैं और भिन्न-भिन्न कर्म करते हैं। श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “तीन गुणों के भेद के अनुसार ज्ञान, कर्म और कर्ता तीन-तीन प्रकार के बताए गए हैं (18.19)। जिस ज्ञान से मनुष्य समस्तप्राणियों में एक अविनाशी परमात्मा को अविभक्त रूप में देखता है उस ज्ञान को सात्विक माना जाता है (18.20)। जिस ज्ञान से मनुष्य अनेक प्रकार के भिन्न-भिन्न जीवों को स्वतंत्र और असंबद्ध रूप में देखता है, वह ज्ञान राजसिक कहा गया है (18.21)। और जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीर में ही सम्पूर्ण के सदृश आसक्त है जो बिना कारण के, बिना तत्त्व के और असत्य पर आधारित है,उसे तामसिक कहा गया है” (18.22)।


237. कर्म के मूल कारण
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#237
Last Sunday at 9:14 AM

श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि कर्मों का पूर्णतः त्याग करना असम्भव है बल्कि त्यागी अपने कर्मों के फलों का त्याग करता है (18.11)। वे कर्म का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए कहते हैं “अधिष्ठान (कर्म का स्थान), कर्ता (कर्म करने वाला), विविध साधन (उपकरण), विभिन्न प्रकार की क्रियाएँ तथा दैवम् (ईश्वरीय तत्व), ये सभी कर्मों की सिद्धि के पाँच कारण हैं। मनुष्य शरीर, मन या वाणी से जो भी कर्म करता है, चाहे वह उचित हो या अनुचित, इनपाँच कारणों से ही वह संपन्न होता है। परंतु जो अल्पबुद्धि है और जिसकी समझ सीमित है, वह स्वयं को ही ‘कर्ता’ मानता है; वह अपनी अशुद्ध बुद्धि के कारण सत्य को नहीं देख पाता” (18.13 से 18.16)।यहाँ अधिष्ठान का अर्थ हमारे मानव शरीर से है क्योंकि शरीर के बिना कोई कर्म किया ही नहीं जा सकता। जहाँ तक कर्ता का प्रश्न है, कई अवसरों पर यह स्पष्ट किया गया है कि वास्तव में तीन गुण ही सभी कर्मों के वास्तविक कर्ता हैं। साधन का स्वरूप और प्रकार समय के साथ बदलते रहते हैं जैसे कि कार, विमान आदि का आविष्कार। अस्तित्व इन साधनों का उपयोग करते हुए विविध प्रकार की गतिविधियों को प्रकट करता है।दैवम् या दैवी शक्ति का प्रभाव कर्म का पाँचवाँ कारण है। यह निस्संदेह एक रहस्यमय कारण है जो हमारी इन्द्रियों की समझ से परे है। दैवम् ही वह कारण है जिसके चलते समान परिस्थितियों में किए गए कर्म भी भिन्न-भिन्न परिणाम देते हैं जिससे हमारे भीतर भ्रम उत्पन्न होता है। श्रीकृष्ण कहते हैं “जो कर्तापन के अहंकार (अहं कृतः) से मुक्त है और जिसकी बुद्धि निर्मल है, वह इन लोगों को मारकर भी वास्तव में किसी को नहीं मारता” (18.17)। इससे पहले भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को द्वन्द्वों के बीच समान भाव रखते हुए युद्ध करने के लिए कहा था (2.38)। यद्यपि ये श्लोक प्रारम्भिक साधक को कुछ असहज प्रतीत हो सकते हैं किंतु इनका चिंतन हमें गहन आत्मबोध की दिशा में ले जाता है।यह एक अस्तित्वगत सत्य है कि हर जन्म का अंत मृत्यु होती है। जहाँ जन्म का स्वागत किया जाता है वहीं मृत्यु को तिरस्कार की दृष्टि से देखा जाता है, विशेषकर जब मृत्यु का स्वरूप या कारण पीड़ादायक हो। इन श्लोकों का संदेश हमें जीवन और मृत्यु के द्वैत से परे जाने के लिए प्रेरित करता है। इन्हें हम उस आधारभूत शिक्षा के रूप में भी देख सकते हैं जो हमें कर्ता से साक्षी की अवस्था की ओर रूपांतरित होने में सहायता करती है।


236. त्यागी
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07/24/2026

श्रीकृष्ण त्यागी को परिभाषित करते हुए कहते हैं “जो लोग न तो अकुशल(अप्रिय या दुःख रूप) कर्म से बचते हैं और न ही कुशल (सुखद या कल्याणकारी) कर्म में आसक्त होते हैं, वे त्यागी हैं। सात्विक गुणों से संपन्न और मेधावी होने के कारण वे संशय रहित होते है” (18.10)।हम सभी कुशल कर्मों को करने के लिए प्रेरित होते हैं और अकुशल कर्मों से बचते हैं। हम ऐसे कर्म करते हैं जो स्वयं की, परिवार, संगठन या समाज की भलाई के लिए होते हैं। हालाँकि यह तर्कसंगत लगता है लेकिन यह कर्मों के अकुशल और कुशल के रूप में विभाजन का परिणाम है। त्यागी वह है जिसके लिए यह आंतरिक विभाजन खत्म हो जाता है। श्रीकृष्ण उन्हें मेधावी कहते हैं जो आंतरिक विभाजन को छोड़ देते हैं। जब विभाजन के अंत से एकता आती है तो उनके संदेह भी समाप्त हो जाते हैं। परिणामस्वरूप, त्यागी न तो किसी कर्म से घृणा करता है और न ही उससे आसक्त होता है।श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “देहधारी जीवों के लिए पूर्ण रूप से कर्मों का परित्याग करना असम्भव है लेकिन जो कर्मफलों का परित्याग करते हैं, वे वास्तव में त्यागी कहलाते हैं (18.11)। कर्मफल का त्याग न करने वाले मनुष्यों के कर्मों का तो अच्छा, बुरा और मिश्रित, ऐसे तीन प्रकार के फल मरने के पश्चात् अवश्य होते हैं; किंतु कर्मफल का त्याग कर देने वाले मनुष्यों के कर्मों का फल न तो इस लोक में और न परलोक में भोगना पड़ता है” (18.12)।अस्तित्व का मूल सत्य यह है कि देहधारी प्राणी कर्मों का त्याग नहीं कर सकते क्योंकि हमारा अस्तित्व ही भोजन करने और श्वास लेने जैसी कई गतिविधियों पर निर्भर करता है। श्रीकृष्ण कर्मफल के त्याग का मार्ग बताते हैं और इस उपदेश को उन्होंने अनेक अवसरों पर दोहराया भी है। यदि कोई कर्मफल से अपने आप को नहीं अलग करता तो क्या होता है? श्रीकृष्ण कहते हैं फल की आकांक्षा रखने वालों को तीन प्रकार के कर्मफलप्राप्त होते हैं; किंतु त्यागी को नहीं। हमारा आसक्ति भाव ही किसी कर्मफल को सुखद या दुःखद बनाता है। त्यागी वह है जो इस आसक्ति को छोड़ देता है और द्वैतों से ऊपर उठकर द्वन्द्वातीत (जो द्वन्द्वों से परे हो गया है) बन जाता है।


235. नियत कर्म
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#235
07/24/2026

भगवद्गीता में कुछ सूत्र ऐसे हैं जो समझने में तो सरल हैं, पर उन्हें जीवन में उतारना अत्यन्त कठिन है। दूसरी ओर, कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें समझ पाना ही चुनौतीपूर्ण है। ऐसा ही एक विषय है -‘नियत कर्म’ (निर्धारित या अनिवार्य कार्य)। यह प्रश्न सदा से मनुष्य को उलझन में डालता रहा है कि हमारे नियत या अनिवार्य कर्तव्य क्या हैं, किन बातों को सहना चाहिए और किन्हें नहीं। विभिन्न ज्ञानी महापुरुषों के ग्रंथों और उपदेशों में इस विषय पर भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ मिलती हैं जो बाहर से देखने पर परस्पर विरोधाभासी प्रतीत होती हैं। स्वयं हमारी समझ भी उम्र और अनुभव के साथ बदलती रहती है।भूख लगने पर भोजन करना और प्यास लगने पर पानी पीना, ये प्राकृतिक नियत कर्म हैं। किंतु जीवन इतना सरल नहीं है; यह अनेक जटिल परिस्थितियाँ हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है। इसलिए श्रीकृष्ण ने पहले ही कहाथा कि यह विषय अत्यन्त सूक्ष्म और जटिल है और यहाँ तक कि ज्ञानीजन भी कर्म और अकर्म (अक्रियता या निष्क्रियता) की सूक्ष्मताओं से भ्रमित हो जाते हैं (4.16)। वे आगे कहते हैं कि कर्म का स्वरूप समझना अत्यन्त कठिन है। अतः नियत या उचित कर्म को भली-भांति समझने के लिए विकर्म (निषिद्ध कर्म) और अकर्म, इन दोनों के स्वरूप को भी जानना आवश्यक है (4.17)।त्याग (संन्यास) और नियत कर्म के संदर्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं “नियत कर्म का कभी भी त्याग नहीं करना चाहिए। मोहवश किया गया ऐसा त्याग तामसिककहा गया है” (18.7)। जो व्यक्ति शारीरिक कष्ट के भय से दुःखदायक कर्म का परित्याग करता है, वह राजसिक त्याग करता है; ऐसा त्याग न तो लाभदायक होता है और न ही आध्यात्मिक रूप से उन्नति देने वाला” (18.8)। जो व्यक्ति आसक्ति और फल की इच्छा का त्याग करके नियत कर्म करता है, उसका त्याग सात्विक त्याग कहा जाता है” (18.9)।इस संदर्भ में श्रीकृष्ण ने पहले कहा कि कुछ योगी देवताओं के लिए यज्ञकरते हैं; अन्य लोग ब्रह्म (परमात्मा) की अग्नि में आहुति देकर बलिदान को ही बलिदान करते हैं। मूलतः यह मन से त्याग के भाव का भी त्याग करना है। यह गुणातीत अवस्था है जो गुणों से परे हो गया है।


234. आसक्ति का त्याग
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#234
07/24/2026

त्याग के विषय में चार प्रकार के मतों या विचारधाराओं का विस्तार से वर्णन करने के बाद श्रीकृष्ण कहते हैं “अब त्याग के विषय में मेरा निश्चय सुनो। त्याग तीन प्रकार के होते हैं” (18.4)। आगे के श्लोकों में वे स्पष्ट करते हैं कि त्याग भी तीन प्रकार का होता है -सात्त्विक, राजसिक और तामसिक। श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “यज्ञ, दान, तथा तपस्या पर आधारित कर्मों का कभी परित्याग नहीं करना चाहिए। इन्हें निश्चित रूप से सम्पन्न करना चाहिए। यज्ञ,दान तथा तपस्या वास्तव में महात्माओं (विद्वानों) को भी शुद्ध करते हैं (18.5)। ये सब कार्य आसक्ति और फल की कामना से रहित होकर संपन्न करने चाहिए। यह मेरा स्पष्ट और अंतिम निर्णय है” (18.6)।अज्ञानता के स्तर पर मनुष्य भौतिक वस्तुएँ, शक्ति, प्रसिद्धि और प्रभाव एकत्रित करता रहता है। त्याग उसका अगला चरण है। कोई इसे लेन-देन के रूप में देख सकता है -जैसे प्रसिद्धि पाने या पुण्य अर्जित करने के लिए दान देना आदि। कभी-कभी त्याग निराशा की अवस्था में भी होता है जैसे अर्जुन का कुरुक्षेत्र के युद्ध को त्यागने का विचार। हम सभी अपने जीवन में ऐसे द्वन्द्वों से गुजरते हैं, इसलिए भगवद्गीता में त्याग और संन्यास के विषय में विस्तार से कहा गया है।श्रीकृष्ण ने कई अवसरों पर संन्यास के विषय में कहा है। उन्होंने बताया कि केवल संन्यास करने मात्र से सिद्धि (परिपूर्णता) प्राप्त नहीं होती (3.4); मनुष्यको सदैव नित्य संन्यासी होना चाहिए अर्थात् वह जो न तो घृणा करता है और न ही इच्छा करता है; जो द्वन्द्वों से मुक्त (द्वन्द्वातीत) है और जो सहज ही सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है (5.3); वही संन्यासी और योगी है जो अपने नियत कर्म को बिना कर्मफल पर निर्भर हुए करता है न कि वह जो केवल कर्मों का त्याग करता है (6.1)।ये शिक्षाएँ यहाँ पुनः प्रतिध्वनित होती हैं जब श्रीकृष्ण कहते हैं यज्ञ, दान और तप जैसे कर्मों का पालन आसक्ति रहित होकर किया जाना चाहिए। वे यहाँ भौतिक वस्तुओं से होने वाले मानसिक बंधनों की ओर संकेत कर रहे हैं। इसी प्रकार कर्मफल की अपेक्षा किए बिना कर्म करना भगवद्गीता की एक अन्य मूल शिक्षा है।


233. त्याग के चार मार्ग
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#233
07/24/2026

भगवद्गीता में अठारह अध्याय और सात सौ श्लोक हैं। अठारहवाँ अध्याय ‘मोक्ष संन्यास योग’ कहलाता है -अर्थात् संन्यास या त्याग के माध्यम से मुक्ति का योग। यह संन्यास या त्याग के मार्ग के द्वारा गंतव्य तक पहुँचना है जो कि मोक्ष या मुक्ति है। यह मुक्ति हमारी विभाजनकारी दृष्टिकोण से मुक्ति है; यह आस्थाओं या मान्यताओं से मुक्ति है; और अंततः, स्वयं त्याग से भी मुक्ति है। यह अध्याय अर्जुन के प्रश्न से शुरू होता है “हे हृषीकेश, मैं संन्यास और त्याग के तत्त्व को और उनके बीच के भेद को स्पष्ट रूप से जानना चाहता हूँ” (18.1)। श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं “कामना से अभिप्रेरित कर्मों के परित्याग को विद्वान् लोग ‘संन्यास’ कहते हैं और सभी कर्मों के फलों के त्याग को बुद्धिमान् लोग त्याग कहते है (18.2)। कुछ मनीषी घोषित करते हैं कि समस्त प्रकार के कर्मों को दोषपूर्ण मानते हुए उन्हें त्याग देना चाहिए किंतु अन्य विद्वान् यह आग्रह करते हैं कि यज्ञ, दान, तथा तपस्या जैसे कर्मों का कभी त्याग नहीं करना चाहिए” (18.3)। श्रीकृष्ण ‘संन्यास’ और ‘त्याग’ शब्दों को परस्पर एक रूप में प्रयोगकरते हैं जिससे यह संकेत मिलता है कि ये दोनों त्याग या वैराग्य के लिए प्रयुक्त दो भिन्न नाम हैं।श्रीकृष्ण हमें त्याग के विषय में प्रचलित चार विचारधाराओं से अवगत कराते हैं। संयोगवश, सभी मत और विश्वास-प्रणालियाँ मूल रूप से इन्हीं विचारधाराओं में से किसी एक पर आधारित हैं। पहले मत के अनुसार त्याग का अर्थ है सभी इच्छा से प्रेरित कर्मों का त्याग करना अर्थात् कर्म करते समय प्रेरणा या स्वार्थ की अनुपस्थिति। दूसरी विचारधारा के अनुसार त्याग का अर्थहै किसी भी कर्म को करते समय कर्म के फल का त्याग करना।तीसरा मत यह कहता है कि सभी कर्म कलुषित (अपवित्र) हैं, अतःउनका पूर्ण परित्याग करना चाहिए। यह दृष्टिकोण ‘कर्तापन’ की भावना को त्यागने की बात करता है और ‘अस्तित्व’ या ‘परमात्मा’ को समस्त कर्मों के कर्ता के रूप में मानता है। अंततः, चौथा मत यह कहता है कि कर्मों के प्रति चयनशील होना चाहिए -यज्ञ, दान और तप जैसे कर्मों का परित्याग नहीं किया जाना चाहिए।चाहे कोई भी मत या विचारधारा क्यों न हो, किसी न किसी रूप में ये सभी मार्ग एक ही गंतव्य -मोक्ष की ओर ले जाते हैं।


232. शुभ कर्म
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#232
07/09/2026

श्रीकृष्ण कहते हैं ‘ॐ तत् सत्’ -यह तीन शब्द परम सत्य, ब्रह्म के त्रिविध प्रतीक हैं। वे आगे ‘सत्’ शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहते हैं “ ‘सत्’ शब्द का अर्थ शाश्वत सत्य और शुभ है। हे अर्जुन! यह शब्द शुभ कर्मों को वर्णित करने के लिए भी प्रयुक्त होता है। जो व्यक्ति यज्ञ, तप और दान में निष्ठापूर्वक स्थित होता है, उसे भी ‘सत्’ कहा जाता है। और इस प्रकार जो भी कर्म इन उद्देश्यों के लिए किया जाता है, वह ‘सत्’ कहलाता है (17.26-27)। परंतु यज्ञ, दान या तप जैसे कर्म यदि श्रद्धा के बिना किया जाता है, वह ‘असत्’ कहलाता है।ऐसे कर्म न इस लोक के लिए उपयोगी होते हैं, न ही परलोक के लिए” (17.28)।श्रीकृष्ण ने ‘सत्’ और ‘असत्’ का वर्णन भगवद्गीता के प्रारम्भ में ही किया था। उन्होंने कहा कि सत् (सत्य / वास्तविक) कभी नष्ट नहीं होता और असत् (अवास्तविक / मिथ्या) का कोई अस्तित्व नहीं होता। इन दोनों के स्वरूप को केवल ज्ञानी पुरुष ही भली-भांति पहचान सकते है (2.16)।‘असत्’ वह है -‘जो न तो अतीत में था और न ही भविष्य में रहेगा’। उदाहरणके लिए इन्द्रिय-सुख, भावनाएँ या भौतिक वस्तुएँ -ये न पहले थीं, न आगे रहेंगी; अतः ये असत् हैं। दूसरे, रस्सी-साँप का उदाहरण यह समझाने के लिए दिया जाता है कि ‘असत्’ का अस्तित्व ‘सत्’ पर निर्भर करता है जैसे रस्सी के बिना साँप का भ्रम भी नहीं होता। एक अन्य उदाहरण दर्पण में दिखाई देने वाला प्रतिबिंब है। जब हम दर्पण के सामने खड़े होते हैं तो उसमें हमारी छवि दिखाई देती है। यह प्रतिबिंब हमारे बिना स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में नहीं रह सकता। हम ‘सत्’ हैं -अर्थात् मूल और वास्तविक सत्ता -जबकि दर्पण में दिखाई देने वाली छवि ‘असत्’ है जिसका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है।श्रीकृष्ण यहाँ एक और मार्ग प्रस्तुत करते हैं जब वे कहते हैं कि जो भी कर्म जैसे यज्ञ, दान या तप, श्रद्धा के बिना किया जाता है, वह ‘असत्’ कहलाता है। अर्थात् ‘सत् कर्म’ करने के लिए श्रद्धा सबसे आवश्यक तत्व है। यह मार्ग एक और व्याख्या प्रस्तुत करता है।श्रद्धा का अर्थ है अविचल भक्ति जहाँ किसी भी कर्म का परिणाम परमात्माका आशीर्वाद मानकर स्वीकार किया जाता है। दूसरे शब्दों में, यह कर्मफल की अपेक्षा किए बिना कर्म करना है (2.47)। यह हमारे द्वारा किए गए किसी भी कर्म में कर्तापन की भावना का त्याग करने से भी प्राप्त होता है। जब कर्तापन और कर्मफल की इच्छा, दोनों का त्याग कर दिया जाता है तब प्रत्येक कर्म शुभ बन जाता है। इसलिए श्रीकृष्ण उसे ‘शुभ कर्म’ कहते हैं।


231. ॐ तत् सत्
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#231
07/03/2026

भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय का शीर्षक ‘श्रद्धा त्रय विभाग योग’ है जिसमें श्रीकृष्ण जीवन और अस्तित्व के प्रत्येक पक्ष के तीन रूपों की व्याख्या करते हैं और कहते हैं कि ‘ॐ तत् सत्’ -ये तीन शब्द परम सत्य, ब्रह्म का त्रिविध प्रतिनिधित्व माने गए हैं। इसी ब्रह्म से ब्राह्मण ग्रन्थ, वेद और यज्ञ उत्पन्न हुए” (17.23)। ‘ॐ तत् सत्’ वेदान्त के संदर्भ में सर्वाधिक प्रचलित वाक्यांश है।ॐ एक मौलिक ध्वनि या कम्पन है। यह माना जाता है कि सृष्टि की उत्पत्ति इसी दिव्य कम्पन ॐ से हुई और विज्ञान भी यह पुष्टि करता है कि सम्पूर्ण पदार्थ निरन्तर कम्पन की अवस्था में रहता है जिसे आवृत्ति (frequency) कहा जाता हैं। ॐ का यह कम्पन तीन अक्षरों -‘अ-उ-म्’ से मिलकर बना है।‘तत्’ का अर्थ ‘वह’ है। ‘तत्’ की व्याख्या ‘सर्वव्यापी सत्य’ के रूप में भी की जाती है। सामान्यतः परमात्मा को ‘तुम’ कहकर संबोधित करना सहज लगता है। परंतु जब हम परमात्मा को ‘तुम’ कहते हैं तो ‘मैं’ भी बना रहता है। इसी कारण श्रीकृष्ण ने ‘तत्’ शब्द का प्रयोग किया है। ‘तत्’ वह अवस्था है जहाँ‘मैं’ और ‘तुम’ दोनों लीन होकर एक हो जाते हैं जैसे नमक की गुड़िया सागर में विलीन होकर स्वयं सागर बन जाती है। यह अस्तित्व के साथ एकाकारहोने की अवस्था का प्रतीक है। वेदांत में इसी भाव को व्यक्त करने के लिए ‘तत् त्वम् असि’ अर्थात् ‘तुम वही हो’ कहा गया है जो मनुष्य और परमात्मा के बीच एकत्व का बोध कराता है।श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “इसलिए, दान, तप और यज्ञ जैसे शास्त्रों में निर्दिष्ट सभी कर्मों का आरंभ सदा ‘ॐ’ उच्चारण से किया जाता है (17.24)। जो लोग मुक्ति के इच्छुक हैं और फल की इच्छा नहीं रखते, वे ‘तत्’ का चिंतन करते हुए विविध दान, तप और यज्ञ करते हैं” (17.25)।जहाँ इच्छा या कामना करना ही बन्धन का कारण होता है वहीं इस श्लोक में मोक्ष की इच्छा का उल्लेख किया गया है जो देखने में विरोधाभासी प्रतीत होता है। पहला चरण भौतिक वस्तुओं की इच्छा है, दूसरा चरण मोक्ष की इच्छा है और अंतिम चरण मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा का भी त्याग करना है। यह एक क्रमिक विकास यात्रा है जैसे प्राथमिक शिक्षा से लेकर स्नातकोत्तर तक की प्रगति। श्रीकृष्ण हमें इस धीरे-धीरे होने वाले आंतरिक परिवर्तन में मार्गदर्शन करते हैं।


230. दान के प्रकार
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#230
07/01/2026

गुणों के संदर्भ में यज्ञ और तप का वर्णन करने के बाद श्रीकृष्ण दान के बारे में कहते हैं “जो दान केवल कर्तव्य समझकर, बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के, उचित समय और स्थान पर, किसी योग्य व्यक्ति को दिया जाता है, वह सात्विक माना जाता है” (17.20)। इस श्लोक में दान के लिए कई प्रकार के निर्देश या नियम निहित हैं।श्रीकृष्ण ने पहले कहा था कि योग न तो उस व्यक्ति के लिए है जो बहुत अधिक खाता है और न ही उस व्यक्ति के लिए जो बिल्कुल नहीं खाता; न ही उसके लिए जो अधिक सोता है और न ही उसके लिए जो हमेशा जागता रहता है (6.16)। इसका अर्थ है परिस्थितियों के अनुसार संतुलित और उचित आचरण करना। बीमारी के समय व्यक्ति का भोजन कम हो जाता है जबकि शारीरिक परिश्रम के बाद भोजन की मात्रा बढ़ जाती है। यह दर्शाता है कि उपयुक्तता समय और स्थान पर निर्भर करती है। अतः इस श्लोक का तात्पर्य है कि उचित आचरण का अर्थ है परिस्थितियों के अनुसार सहज रूप से ढल जाना और प्रवाह के साथ चलना।दान की उपयुक्तता उस व्यक्ति के संदर्भ में भी होती है जिसे दान दिया जा रहा है। यह उसी प्रकार है जैसे परमाणु तकनीक जैसे दोहरे उपयोग (dual-use) वाली तकनीकें रखने वाले देश, उन देशों को यह तकनीक नहीं देते जोउसका दुरुपयोग कर सकते हैं। इसी प्रकार प्राचीन समय में गुरु तब तक किसी शक्तिशाली तंत्र या साधना की शिक्षा नहीं देते थे जब तक उन्हें यह विश्वास न हो जाए कि शिष्य उसका उपयोग समाज के कल्याण के लिए करेगा।‘कर्तव्य के रूप में दान’ एक जटिल विषय है क्योंकि यह प्रश्न उठाता है कि क्या कर्तव्य है और क्या नहीं। उदाहरण के लिए बीजावरण का कर्तव्य बीज की रक्षा करना है और बाद में स्वयं नष्ट होकर अंकुर को बाहर आने देना। इस प्रकार कर्तव्य के स्वभाव को समझना कोई सरल कार्य नहीं है।श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “जो दान अनिच्छा से, प्रत्युपकार की आशा में या किसी फल की अपेक्षा से दिया जाता है, वह राजसिक दान कहलाता है” (17.21)। “जो दान अनुचित स्थान और समय पर, अयोग्य व्यक्तियों को, बिना सम्मान के या तिरस्कारपूर्वक दिया जाता है, वह तामसिक दान कहा गया है” (17.22)।


229. तप के प्रकार
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#229
06/26/2026

तप के प्रकार


228. यज्ञ के प्रकार
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#228
06/26/2026

यज्ञ के प्रकार


227. मन और उदर का संबंध
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#227
06/26/2026

मन और उदर का संबंध


226. गुण और श्रद्धा
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#226
06/26/2026

गुण और श्रद्धा


225. शास्त्र एवं स्वधर्म
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#225
06/26/2026

शास्त्र एवं स्वधर्म


224. नरक के तीन द्वार
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#224
06/26/2026

नरक के तीन द्वार


223. बुराई का फल बुरा ही होता है
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#223
05/09/2026

श्रीकृष्ण आसुरी प्रवृत्ति वालों का विस्तार से वर्णन करते हुए कहते हैं,"ऐसे अनेक प्रकार से भ्रमित मन वाले, मोह के जाल में उलझकर तथा विषय-भोगों में आसक्त होकर घोर नरक में गिरते हैं (16.16)। ऐसे अभिमानी और हठी लोग, संपत्ति के मद और अहंकार से मदमस्त होकर, शास्त्रों के विधि-विधानों का आदर न करते हुए पाखंडपूर्वक केवल नाम मात्र के लिए यज्ञ करते हैं (16.17)। अहंकार (मैं कर्ता हूँ), बल, दम्भ, कामना और क्रोध से अंधे होकर, ये द्वेषी पुरुष अपने भीतर तथा अन्य सभी प्राणियों में निवास करने वाले मुझ अन्तर्यामी को तुच्छ समझते हैं (16.18)। इन द्वेष करनेवाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में डालता हूँ (16.19)। ये अज्ञानी आत्माएँ आसुरी योनियों में बार-बार जन्म लेती हैं। हे अर्जुन, वे मूढ़ मुझे प्राप्त न कर पाने पर, धीरे-धीरे आसुरी योनियों को और उससे भी अति अधम गति को ही प्राप्त होते हैं" (16.20)।श्रीकृष्ण ने पहले कहा था कि वे सभी जीवों के प्रति समान भाव रखते हैं। उनके लिए न तो कोई द्वेष्य है और न ही कोई प्रिय है (9.29)। लेकिन उपरोक्त श्लोक संकेत करते हैं कि वे आसुरी प्रवृत्ति वालों से घृणा करते हैं और इसलिए उन्हें अधम योनियों में रखते हैं।यह प्रत्यक्ष विरोधाभास हमारे इस भ्रम से उत्पन्न होता है कि श्रीकृष्ण (परमात्माका नाम व्यक्ति की आस्था के आधार पर भिन्न हो सकता है) एक व्यक्ति हैं, जबकि वे वास्तव में स्वयं अस्तित्व हैं। वे केवल उन नियमों कावर्णन कर रहे हैं जो अस्तित्व को संचालित करते हैं। यह गुरुत्वाकर्षण के नियम की तरह है जहाँ ऊँचाई से कूदने पर गिरना अनिवार्य है। श्रीकृष्ण ने पहले इसका वर्णन इस प्रकार किया था, "व्यक्ति जिस भी प्रकार से मुझे भजते हैं, मैं उसी प्रकार से उन्हें प्राप्त होता हूँ" (4.11)। जब कोई आसुरी मार्ग अपनाता है, तो सम्भवतः समय के साथ, अस्तित्व स्वतः ही आसुरी ढंग से प्रतिक्रिया करता है।हमारा भौतिक शरीर विकास, उत्कृष्ट शिल्पकला और सुसंगति के संदर्भ में अस्तित्व की अनन्त उदारता का सर्वोत्तम उदाहरण है। यह हमें जो कुछ भी दिया गया है, उसके लिए कृतज्ञ होने के बारे में है, न कि इंद्रिय तृप्ति के लिए अस्तित्व से कुछ हड़पने के लिए।


222. शक्ति का दर्प सही नहीं
222. शक्ति का दर्प सही नहीं episode artwork
#222
04/29/2026

श्रीकृष्ण कहते हैं कि आसुरी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति सोचता है, “मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस इच्छा को पूरा करूँगा। यह सब मेरा है और कल मुझे इससे भी अधिक मिलेगा (16.13)। मैंने इस शत्रु को मार डाला है और अन्य शत्रुओं को भी मार डालूँगा। मैं मनुष्यों में शासक हूँ; मैं भोगी हूँ, मैं पूर्ण, शक्तिशाली और सुखी हूँ (16.14)। मैं धनवान और कुलीन हूँ; मेरे समान और कौन है? मैं त्याग करूँगा, मैं दान करूँगा, मैं आनंद मनाऊँगा।" इस प्रकार, आसुरी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति अज्ञानता से मोहित हो जाते हैं (16.15)। ​​आज की दुनिया में, इसे अक्सर 'सफलता' समझ लिया जाता है।यह अहंकार की भाषा है जो दूसरों से तुलना करने से पनपती है। आसुरी व्यक्ति अहंकार से ग्रसित होता है, जो दूसरों की तुलना में अधिक धन अर्जित करने में सफलता मिलने पर, शत्रुओं के परास्त होने पर, या उन्नति के शिखर पर पहुँचने पर शासक जैसा अनुभव करता है। ऐसा होने पर अहंकार में वृद्धि होती है।तुलना इच्छाओं को प्रेरित करती है, जिसमें संचय और इंद्रिय तृप्ति की इच्छा भी शामिल हैं। लेकिन इंद्रिय तृप्ति का कोई अंत नहीं है और श्रीकृष्ण इसे अज्ञानजनित मोह कहते हैं। श्रीकृष्ण ने अज्ञान का नाश करने के लिए ज्ञान की तलवार का उपयोग करने के लिए कहा था (4.41) और कहा था कि इस संसार में ज्ञान से अधिक पवित्र कुछ भी नहीं है। समय आने पर, जिसने योग सिद्ध कर लिया है, वह इसे स्वयं में पा लेता है (4.38)। इसकी कुंजी है सबूरी (धैर्य) के साथ श्रद्धा।हमारी वर्तमान स्थिति चाहे जो भी हो, ज्ञान योग के अभ्यास से हम उपयुक्त समय में ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। सार यह है कि जब हम तुलना करते हैं तो स्वयं का अवलोकन करें; एक अच्छे विद्यार्थी की तरह इन प्रवृत्तियों पर प्रश्न करें (4.34), ताकि हम स्वयं को बेहतर बना सकें। श्रीकृष्ण ने पहले आश्वासन दिया था कि योग के अभ्यास में छोटे कदम भी परिणाम देते हैं (2.40)।


221. साधन और साध्य - दोनों शुद्ध हों
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#221
04/23/2026

श्रीकृष्ण आसुरी स्वभाव वालों के बारे में आगे कहते हैं, "यह मानते हुए कि यह सारा संसार शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए है, ऐसे लोग मृत्युपर्यंत सांसारिक चिंताओं में डूबे रहते हैं (16.11)। सैकड़ों इच्छाओं, काम और क्रोध के बन्धन में बंधे हुए, वे अपनी इंद्रियों की तृप्ति के लिए अन्यायपूर्ण तरीकों से धन संचय करने का प्रयास करते हैं" (16.12)। जब इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं, तो क्रोध स्वाभाविक है, इस प्रकार वे साथ-साथ चलते हैं। इसीलिए इंद्रियों पर नियंत्रण भगवद्गीता के प्रमुख उपदेशों में से एक है।जब कोई संचय को लक्ष्य बनाता है, तो उसकी प्रवृत्ति उसे प्राप्त करने की ओर अपनी सारी ऊर्जा लगाने की होती है। इस मार्ग पर, व्यक्ति उक्त लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनाए गए सभी साधनों को उचित ठहराने की कोशिश करता है, चाहे वे साधन नैतिक हों या अनैतिक। इस प्रक्रिया में दूसरों को हड़पना शामिल है - यह संपत्ति या अच्छे काम का श्रेय हो सकता है; यह बाजार में हिस्सेदारी हड़पना या मन में जगह बनाना हो सकता है जिसे स्वार्थी उद्देश्यों के लिए 'दूसरों को प्रभावित करना' कहा जाता है जैसा कि सामाजिक संचार माध्यम (सोशल मीडिया) पर किया जाता है। श्रीकृष्ण जमाखोरी को हतोत्साहित करते हैं और जमा करने वालों को चोर कहते हैं (3.12)। वह हमें देने और लेने के प्राकृतिक चक्र का हिस्सा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। उन्होंने जल चक्र का उदाहरण दिया जिसमें वर्षा और वाष्पीकरण के निःस्वार्थ कर्म (यज्ञ) शामिल हैं।इसका मतलब अपने पेशे या कर्मों का त्याग करना नहीं है। श्रीकृष्ण ने पहले हमें कर्मों का त्याग करने के लिए नहीं, बल्कि घृणा का त्याग करने के लिए कहा था। एक बार घृणा का त्याग हो जाए, तो उसका ध्रुवीय विपरीत, यानी आसक्ति या हड़पना, स्वतः ही गायब हो जाएगा।विकास और सुधार प्रकृति का अभिन्न अंग हैं। इस प्रक्रिया में, बेहतर प्रजातियाँ विकसित होती हैं; जीवन की गुणवत्ता समय के साथ बेहतर होती जाती है। सार यह है कि संचय में लिप्त होने के बजाय प्रवाह के साथ आगे बढ़ें। संचय के प्रति यह आसक्ति ही वह बन्धन है जिसे श्रीकृष्ण ने आसुरी व्यक्ति की पहचान बताया है।


220. तर्क से परे
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#220
04/23/2026

तर्क से परे


219. बन्धन से मुक्ति
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#219
03/25/2026

श्रीकृष्ण कहते हैं, “तेज (चरित्र का तेज), क्षमा, धैर्य, पवित्रता, शत्रुभाव का न होना और प्रतिष्ठा की इच्छा से मुक्त होना; ये सब दिव्य प्रवृत्ति से संपन्न लोगों के दैवीय गुण हैं (16.3)। दम्भ, अहंकार, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञानता उस व्यक्ति के लक्षण हैं जो आसुरी प्रवृत्ति के साथ जन्म लेता है (16.4)। संसार में दो प्रकार के प्राणी हैं- एक वे जो दैवीय गुणों से सम्पन्न हैं और दूसरे वे जो आसुरी प्रवृत्ति के हैं (16.6)। दैवीय प्रकृति मोक्ष प्रदान करती है;जबकि आसुरी गुण निरंतर बन्धन की नियति का कारण होते हैं”(16.5)। चूँकि मुक्ति और बन्धन अनुभवजन्य हैं, इसलिए उनके बारे में कोई भी व्याख्या स्पष्टता प्रदान करने के बजाय भ्रम पैदा करेगी।फँसे हुए बंदर की कहानी हमें बन्धन और मुक्ति के बीच के द्वैत को समझने में मदद करेगी। एक संकरे मुँह वाले सुराही में कुछ मेवे रखे जाते हैं, जिसमें बंदर का हाथ मुश्किल से समा पाता है। बंदर सुराही के मुँह से अपना हाथ अंदर डालता है और मुट्ठी भर मेवे पकड़ लेता है। मुट्ठी भर जाने पर उसका आकार बढ़ जाता है, इसलिए वह सुराही से बाहर नहीं निकल पाता और बंदर सुराही से बंध जाता है। हालाँकि बंदर अपनी बंद मुट्ठी को सुराही से बाहर निकालने के लिए हर सम्भव प्रयास करता है, लेकिन जब तक उसे यह एहसास नहीं हो जाता कि जाल उसने खुद ही बिछाया है, तब तक वह मुक्त नहीं हो सकता।विभाजन और उससे उत्पन्न तुलनाएँ; अतीत में जीना या भविष्य से अपेक्षाएँ; धन, विलासिता, शक्ति, मित्रों, शत्रुओं, काम, शराब या यहाँ तक कि दैनिक दिनचर्या से लगाव, बंदर की मुट्ठी में बंद उन मेवों की तरह हैं जो हमें बाँधते हैं। जहाँ कुछ और बनने या कुछ हड़पने की इच्छा बन्धन है, वहीं स्वयं को विलीन कर अस्तित्व के साथ एकाकार हो जाना मुक्ति है।जीवन हमारे सामने विभिन्न परिस्थितियाँ प्रस्तुत करता है, परंतु जब हम उन्हें उसी प्रकार आत्मसात करना सीख जाते हैं जैसे सागर नदियों को अपने में समाहित कर लेता है (2.70), जहाँ हमारी प्रतिक्रियाएँ उन परिस्थितियों से अप्रभावित रहती हैं; वही वास्तविक मुक्ति है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण द्वाराबताए गए पड़ाव हमारी मुक्ति के मार्ग पर हुई प्रगति को परखने के मार्गदर्शक संकेतक बन सकते हैं।


218. अहिंसा
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#218
03/23/2026

श्रीकृष्ण कहते हैं, “अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शान्ति, निन्दा न करना, सभी प्राणियों पर दया, लोभ से मुक्ति, नम्रता, विनयशीलता, स्थिरता ये सब दैवीय गुण हैं (16.2)। जबकि अहिंसा एक दिव्य गुण है, कुरुक्षेत्र का हिंसक युद्ध एक बड़ी बाधा है जिसे भगवद्गीता को समझने के लिए पार करने की आवश्यकताहै।सबसे पहले, इस विरोधाभास का उत्तर श्रीकृष्ण ने पहले ही दे दियाथा जब उन्होंने अर्जुन से कहा था कि यदि वह सुख-दुःख, लाभ-हानि और जीत-हार के बीच आंतरिक संतुलन बनाए रखते हुए युद्ध लड़ेगा तो उसे कोई पाप नहीं लगेगा (2.38)। यह आंतरिक संतुलन या समत्व, अहिंसा के अलावा और कुछ नहीं है। अक्रोध (क्रोध से मुक्ति), एक और दैवीय गुण है जो इस आंतरिक संतुलन का परिणाम है। दूसरी ओर, असंतुलन से उत्पन्न कोई भी कार्य हिंसा है।दूसरे, श्रीकृष्ण कहते हैं कि सर्वश्रेष्ठ योगी वह है जो दूसरों के प्रति सुख-दुःख में वैसा ही भाव रखता है जैसा वह स्वयं के लिए रखता है (6.32)। यह ईर्ष्या के बिना दूसरों के सुख को अपना सुख मानना है; यह परपीड़न या व्यंग्य के बिना दूसरों के दुःख को अपना दुःख मानना है। दूसरों के प्रति ऐसी भावना अहिंसा है। निंदा भी एक प्रकार की हिंसा है जो हम झूठे और अपमानजनक बयान देकर दूसरों पर करते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण ने निंदा न करने को एक दिव्य गुण के रूप में शामिल किया। त्याग का एक और दिव्य गुण घृणा का त्याग है (5.3)।श्रीकृष्ण ने पहले दूसरों को स्वयं में और स्वयं को दूसरों में देखने का मार्ग बताया था (6.29-6.30)। यह दर्शाता है कि हममें भी वे अवगुण हैं जिनकी हम दूसरों में आलोचना करते हैं और दूसरों में भी वे अच्छे गुण हैं जिनकी हम प्रशंसा करते हैं। इसे समझना ही सभी प्राणियों के प्रति करुणा और सौम्यता जैसे दिव्य गुणों को प्राप्त करना है।सत्य (सत्यवादिता) का अर्थ है अनुकूल और प्रतिकूल दोनों हीपरिस्थितियों में बिना किसी शर्त के सत्यवादी होना। यह गुण भी हमारेआंतरिक संतुलन की उपज है।


216. भय से पार पाना
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#216
03/20/2026

भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय का शीर्षक ‘दैव-असुर सम्पद विभाग योग’ है। इसका अर्थ है दैवी और आसुरी स्वभावों के बीच के भेद को समझकर परमात्मा से एकत्व की प्राप्ति करना। हममें से प्रत्येक व्यक्ति में अनेक गुण होते हैं, जिन्हें दैव (दैवी) और असुर (आसुरी) कहा जा सकता है। दैव वह आंतरिक यात्रा है जो परमात्मा की ओर ले जाती है, जबकि असुर प्रवृत्ति हमें उनसे दूर ले जाती है। श्रीकृष्ण ने ‘अभयं’ (भय का आभाव) को दैवी गुणों में प्रथम बताया है (16.1)। यद्यपि अभयं का अर्थ सामान्यतः निर्भयता के रूप में किया जाताहै, किंतु उसका भावार्थ इससे कहीं अधिक गहन है।भगवद्गीता को समझने के लिए हमें हमेशा तीसरे विकल्प को ध्यान में रखना चाहिए। जैसे कि राग और विराग से परे की तीसरी अवस्था वीत-राग है। इसी तरह, आसक्ति और विरक्ति से परे की तीसरी अवस्था अनासक्ति है। हम आसक्ति/राग या विरक्ति/विराग के द्वंद्वों से भली-भाँति परिचित हैं, लेकिन तीसरी अवस्था तक पहुँचना एक चुनौती है। ऐसा ही 'अभय' भी है, जोभय और निर्भयता दोनों से परे है। जहाँ भय एक आंतरिक भावना की अभिव्यक्ति है, वहीं निर्भयता उस भावना का दमन हो सकता है, हालाँकि, अभय दोनों से परे है।सबसे पहले, मनचाहा फल न मिलने पर भय और क्रोध उत्पन्न होता है। अभय का अर्थ है कर्मफल का त्याग करके, जो भी परिणाम मिले उसे ईश्वर का आशीर्वाद मानकर स्वीकार करना (2.47), और सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय के बीच आंतरिक संतुलन बनाए रखना (2.38)।दूसरा, मृत्यु हमारा मूलभूत भय है जिसमें हमारी मान्यताओं, प्रतिमानों, अच्छे समय का अंत (मृत्यु) और हमारी संपत्ति की हानि (मृत्यु) भी शामिल है। अभय का अर्थ है 'अपनी मान्यताओं के विपरीत' के परिणामों को स्वीकार करना है, क्योंकि वे भी परमात्मा का ही अंश हैं। वास्तव में, कुछ संस्कृतियाँ अभय प्राप्त करने के साधन के रूप में मृत्यु के उपयोग को प्रोत्साहित करती हैं। श्रीकृष्ण ने परमात्मा की ओर यात्रा में अभय को पहली आवश्यकता के रूप मेंरखा है, क्योंकि सागर में नमक की गुड़िया के घुलने की तरह स्वयं को विलीनकरने के लिए, उनके भयंकर विश्वरूप का सामना करने के लिए, अभय आवश्यक है।


215. खुला रहस्य
215. खुला रहस्य episode artwork
#215
03/20/2026

भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय को 'पुरुषोत्तम योग' कहा जाता है। यह शीर्षक निम्नलिखित श्लोक से लिया गया है जहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं, "मैं नाशवान कार्य प्रकृति (सृष्टि) से परे हूँ और अविनाशी आत्मा (कूटस्थ) से भी उत्तम हूँ। इसलिए, वेदों और जगत में मुझे पुरुषोत्तम कहा गया है" (15.18)।एक बार जब जागरूकता स्थापित होने लगती है, तो हमारे सामने दो मूलभूत प्रश्न आते हैं: हमें क्या करना चाहिए और हमें क्या जानना चाहिए? श्रीकृष्णने पहले प्रश्न के उत्तर में हमारे सभी कर्मों को उनको अर्पण करके हमें ममत्व रहित (निर्-मम) और आशा रहित (निर्-आशा) रहने को कहा था (3.30)। श्रीकृष्ण दूसरे प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं, "जो ज्ञानी पुरुष मुझे पुरुषोत्तम के रूप में जानते हैं, वास्तव में वे सब कुछ जानते हैं। वे पूर्ण रूप से मेरीपूजा करते हैं" (15.19)। हालाँकि यह एक सरल और खुला रहस्य है, 'सब कुछ जानना' तब सम्भव होता है जब जानना अस्तित्वगत स्तर पर होता है।श्रीकृष्ण ने हमें हर समय उनका स्मरण करने का निर्देश दिया था, और अब वे हमें अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ उनकी आराधना करने के लिए कहते हैं। हर क्षण और अपनी प्रत्येक कोशिका के साथ उनकी आराधना करना असम्भव प्रतीत होता है। इस पहेली की कुंजी पहले दी गई है, 'सभी प्राणियों में स्वयं को और स्वयं में सभी प्राणियों को देखना और उन्हें सर्वत्र देखना' (6.29 और6.30)।श्रीकृष्ण इस अध्याय का समापन करते हुए कहते हैं, "मैंने तुम्हें वैदिक ग्रंथों का अति रहस्ययुक्त (गोपनीय) शास्त्र समझाया है। इसे समझकर मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है और अपने प्रयासो में परिपूर्ण हो जाता है" (15.20)। इसका तात्पर्य यह है कि इस संसार में इस ज्ञान को प्राप्त करना ही हमारा परम कर्तव्य है।श्रीमद्भागवत पुराण में, श्रीकृष्ण ने उपरोक्त श्लोकों में जो कहा है, उनके साक्षात्कार करने का एक सरल मार्ग बताया है। वे कहते हैं कि जब हम किसी चोर, गधे या शत्रु को देखें, तो उनमे हम आत्मतत्त्व रूप श्रीकृष्ण को ही महसूस करें। निश्चित रूप से, यह समझना आसान है, लेकिन आचरण मेंलाना कठिन है। मूलतः, सबके पीछे वही पुरुषोत्तम हैं।


215. खुला रहस्य
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#215
03/08/2026

भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय को 'पुरुषोत्तम योग' कहा जाता है। यह शीर्षक निम्नलिखित श्लोक से लिया गया है जहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं, "मैं नाशवान कार्य प्रकृति (सृष्टि) से परे हूँ और अविनाशी आत्मा (कूटस्थ) से भी उत्तम हूँ। इसलिए, वेदों और जगत में मुझे पुरुषोत्तम कहा गया है" (15.18)।एक बार जब जागरूकता स्थापित होने लगती है, तो हमारे सामने दो मूलभूत प्रश्न आते हैं: हमें क्या करना चाहिए और हमें क्या जानना चाहिए? श्रीकृष्णने पहले प्रश्न के उत्तर में हमारे सभी कर्मों को उनको अर्पण करके हमें ममत्व रहित (निर्-मम) और आशा रहित (निर्-आशा) रहने को कहा था (3.30)। श्रीकृष्ण दूसरे प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं, "जो ज्ञानी पुरुष मुझे पुरुषोत्तम के रूप में जानते हैं, वास्तव में वे सब कुछ जानते हैं। वे पूर्ण रूप से मेरीपूजा करते हैं" (15.19)। हालाँकि यह एक सरल और खुला रहस्य है, 'सब कुछ जानना' तब सम्भव होता है जब जानना अस्तित्वगत स्तर पर होता है।श्रीकृष्ण ने हमें हर समय उनका स्मरण करने का निर्देश दिया था, और अब वे हमें अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ उनकी आराधना करने के लिए कहते हैं। हर क्षण और अपनी प्रत्येक कोशिका के साथ उनकी आराधना करना असम्भव प्रतीत होता है। इस पहेली की कुंजी पहले दी गई है, 'सभी प्राणियों में स्वयं को और स्वयं में सभी प्राणियों को देखना और उन्हें सर्वत्र देखना' (6.29 और6.30)।श्रीकृष्ण इस अध्याय का समापन करते हुए कहते हैं, "मैंने तुम्हें वैदिक ग्रंथों का अति रहस्ययुक्त (गोपनीय) शास्त्र समझाया है। इसे समझकर मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है और अपने प्रयासो में परिपूर्ण हो जाता है" (15.20)। इसका तात्पर्य यह है कि इस संसार में इस ज्ञान को प्राप्त करना ही हमारा परम कर्तव्य है।श्रीमद्भागवत पुराण में, श्रीकृष्ण ने उपरोक्त श्लोकों में जो कहा है, उनके साक्षात्कार करने का एक सरल मार्ग बताया है। वे कहते हैं कि जब हम किसी चोर, गधे या शत्रु को देखें, तो उनमे हम आत्मतत्त्व रूप श्रीकृष्ण को ही महसूस करें। निश्चित रूप से, यह समझना आसान है, लेकिन आचरण में लाना कठिन है। मूलतः, सबके पीछे वही पुरुषोत्तम हैं।


214. कैसे और क्यों
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#214
03/07/2026

परमात्मा अनन्त सागर के समान हैं और आत्मा एक अविनाशी बूंद है जो नाशवान मानव शरीर में स्थित है। श्रीकृष्ण उस सागर का वर्णन करते हुए कहते हैं, "सूर्य में स्थित तेज जो सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और अग्नि में भी है, उसको तू मेरा ही तेज जान (15.12)। मैं पृथ्वी में व्याप्त होकर सभी जीवों को अपनी शक्ति से पोषित करता हूँ। चन्द्रमा के रूप में मैं सभी वनस्पतियों को जीवन रस से पोषित करता हूँ" (15.13)।" मैं वैश्वानर (तेज शक्ति) बनकर सभी प्राणियों के शरीर में स्थित हूँ, प्राण (श्वास) और अपान (प्रश्वास) से युक्त होकर चतुर्विध अन्न को पचाता हूँ (15.14)। मैं समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित; और मुझसे ही स्मृति (आत्म-जागरूकता), ज्ञान और अपोहन (संदेहों का समाधान) उत्पन्न होते हैं। मैं ही समस्त वेदों द्वारा जानने योग्य हूँ, मैं ही वेदान्त का रचयिता और वेदों के अर्थों को जानने वाला हूँ" (15.15)।सबसे पहले, श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे सूर्य का तेज हैं और सभी जीवों को ऊर्जा से पोषित करते हैं। पौधे इसे हमारे भोजन में बदल देते हैं। अतीत का सूर्य का प्रकाश ही वह है जिसका उपयोग हम जीवाश्म ईंधन (fossil fuel) केरूप में करते हैं। सूर्य का प्रकाश जल को तरल अवस्था में रखता है। इसलिए, यह हमें जीवित रहने और अस्तित्व में रहने में सक्षम बनाता है।दूसरे, श्रीकृष्ण ने मानव शरीर में होने वाली असंख्य प्रक्रियाओं को समझाने के लिए पाचन और श्वास प्रक्रिया को रूपकों के रूप में चुना। यह किसी शल्यचिकित्सक के चीरे के ठीक होने जैसा है; यह शरीर के विभिन्न अंगों और रसायनों के बीच सामंजस्य है जो इसे क्रियाशील बनाता है। विज्ञान 'कैसे' का उत्तर देने में तो कुशल है, लेकिन 'क्यों' का नहीं। 'प्रकाश कैसे कार्य करता है' की व्याख्या की गई है, लेकिन 'प्रकाश द्वैत क्यों है' जैसे प्रश्नों के उत्तर अनिश्चित छोड़ दिए हैं । इन श्लोकों में श्रीकृष्ण बताते हैं कि वे ही इन 'क्यों' के मूल स्रोत हैं। हालाँकि हम 'कैसे और क्यों' के निश्चित उत्तर खोजने के लिए संघर्ष करते हैं, लेकिन ये मूलतः उनकी लीला या दिव्य नाटक की अभिव्यक्तियाँ हैं।


213. परमात्मा और आत्मा
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#213
03/06/2026

श्रीकृष्ण विभिन्न संदर्भों में 'सृष्टि' की व्याख्या करते हैं और संकेत देते हैं कि सम्पूर्ण अस्तित्व प्रकृति और पुरुष का समन्वय है। उनका गर्भ महत्-ब्रह्म (महान प्रकृति) है जिसमें वे बीज स्थापित करते हैं जो सभी प्राणियों के जन्म का कारण है (14.3)। गुण और विकार प्रकृति से उत्पन्न होते हैं (13.20) और प्रकृति ही कारण और प्रभाव के लिए भी उत्तरदायी है; पुरुष सुख और दुःख के द्वंद्वों का अनुभव करने के लिए उत्तरदायी है (13.21)।श्रीकृष्ण आगे विस्तार से बताते हैं और कहते हैं, "सृष्टि में दो प्रकार के पुरुष हैं, क्षर (नाशवान) और अक्षर (अविनाशी)। नाशवान वे सभी प्राणी हैं जो भौतिक जगत में हैं। अविनाशी को कूटस्थ (आत्मा) कहते हैं (15.16)। लेकिन एक और शाश्वत सर्वोच्च सत्ता है जिसे परमात्मा कहते हैं। तीनों लोकों में व्याप्त होकर, वे उनका पालन करते हैं" (15.17)। मूलतः, यह शाश्वत परमात्मा ही है जो अविनाशी आत्मा और नाशवान भौतिक जगत (प्रकृति) दोनों का पालन करता है।वर्तमान वैज्ञानिक समझ यह है कि आरंभ में केवल शुद्ध ऊर्जा ही थी। समय के साथ, कुछ ऊर्जा पदार्थ में परिवर्तित हो गई। यह पदार्थ नाशवान है और कुछ भौतिक नियमों का पालन करता है, जिन्हें श्रीकृष्ण ने कारण और प्रभाव कहा है। यही पदार्थ जीवों के भौतिक शरीर बनाता है और इन जीवों को जीवित रहने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। संक्षेप में, हम अपने आस-पास जो कुछ भी देखते हैं, वह ऊर्जा और पदार्थ का परस्पर प्रभाव है।यह वर्तमान समझ उपरोक्त श्लोकों के अनुरूप है, जहाँ श्रीकृष्ण ने कहा कि वह अपने गर्भ (जिसे यहाँ प्रकृति कहा गया है) में बीज (जिसे यहाँ अविनाशी पुरुष या आत्मा कहा गया है) स्थापित करते हैं और जीवन का आरंभ होता है।श्रीकृष्ण एक आयाम और जोड़ते हुए कहते हैं कि वे प्रकृति और पुरुष दोनों से परे हैं फिर भी उन दोनों का आधार और सहारा हैं। यह स्पष्टता हमें आत्मा और परमात्मा का बोध कराती है।


212. पुनर्जन्म के नियम
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#212
02/25/2026

श्रीकृष्ण ने जीवन की एक रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि उनका एक अंश देहधारी आत्मा के रूप में प्रकट होता है और इंद्रियों को आकर्षित करता है जो प्रकृति का हिस्सा हैं। यह संकेत करता है कि इच्छाएँ ही इंद्रियों को आकर्षित करती हैं। उदाहरण के लिए, देखने या सुनने की इच्छा के कारण, क्रमशःआँख या कान जैसी इंद्रियों का विकास हुआ।वे आगे देहधारी आत्मा के शरीर त्यागने और नए शरीर में प्रवेश करने की प्रक्रिया के बारे में बताते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं, "जैसे वायु सुगंध को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है, वैसे ही देहधारी आत्मा मन और इंद्रियों को (सूक्ष्म शरीर को) अपने साथ ले जाती है, जब वह एक पुराने शरीर को छोड़कर नए शरीर में प्रवेश करती है (15.8)। मोहग्रस्त लोग आत्मा को शरीर में निवास करते हुए, शरीर से प्रस्थान करते हुए या इंद्रियों के द्वारा विषयों का अनुभव करते हुए नहीं देख सकते। केवल ज्ञानचक्षु वाले देख सकते हैं (15.10)।मुक्ति के लिए प्रयत्नशील योगी परमात्मा को अपने भीतर विद्यमान देखते हैं; लेकिन अशुद्ध मन वाले अज्ञानीजन परमात्मा को अनुभव करने मेंअसमर्थ होते हैं, भले ही वे ऐसा करने के लिए संघर्ष करते हों" (15.11)। शुद्धताऔर कुछ नहीं बल्कि सुख-दुःख; लाभ-हानि; और जय-पराजय के बीच संतुलन है (2.38)।यह श्रीकृष्ण के द्वारा अर्जुन को पहले दिए गए आश्वासन का विस्तार है कि जब कोई व्यक्ति श्रद्धा के साथ वैराग्य और अभ्यास के माध्यम से शाश्वत अवस्था के जिस बिंदु पर देह त्याग करता है, वह अपने अगले जन्म में उसी बिंदु से शुरू करेगा जहाँ से उसने पिछले जन्म में छोड़ा था (6.37-6.45)। अनिवार्य रूप से, अनासक्ति की कुल्हाड़ी के उपयोग का अनुभव अगले जन्म तक साथ रहता है।श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि प्रयास आवश्यक हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं हैं क्योंकि मुक्ति (शाश्वत अवस्था) प्राप्त करने के लिए हमें मन और हृदय की शुद्धता आवश्यक है। यह परमाणु हथियार बनाने के प्रयासों के समान है, लेकिनहृदय की शुद्धता का अभाव विनाश का कारण बन सकता है। यही कारण है कि कई संस्कृतियाँ और परंपराएँ ध्यान जैसी आध्यात्मिक तकनीकों को अपनाने से पहले आंतरिक शुद्धता पर जोर देती हैं।


211. जीवन की रूपरेखा
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#211
02/01/2026

सृष्टि को परमात्मा की लीला या दिव्य नाटक कहा जाता है और यहाँ गंभीरता से लेने जैसा कुछ भी नहीं है। इस दिव्य नाटक में कुछ नियमों का पालन किया जाता है। श्रीकृष्ण इन नियमों की व्याख्या करते हुए कहते हैं, "इस भौतिक संसार की जीवात्माएँ मेरी शाश्वत आत्मा का केवल एक अणु अंश मात्र हैं और पाँच इंद्रियों और मन को आकर्षित करती हैं, जो प्रकृति का एक हिस्सा हैं (15.7)। श्रवण, दृष्टि, स्पर्श, स्वाद, गंध की ग्राहिका इंद्रियों तथा मन को अधिष्ठान बनाकर यह जीवात्मा इंद्रिय विषयों का भोग करता है" (15.9)। श्रीकृष्ण ने पहले प्रकृति और पुरुष को अनादि कहा था। गुण और विकार प्रकृति से पैदा होते हैं (13.20)। प्रकृति कारण और प्रभाव के लिए जिम्मेदार है; पुरुष सुख और दुःख के द्वंद्वों का अनुभव करने के लिए जिम्मेदार है (13.21)। साथ मिलकर ये श्लोक जीवन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं।सबसे पहले, परमात्मा का एक अंश प्रत्येक प्राणी के भीतर विद्यमान है जिसे हम आत्मा कहते हैं और इस अर्थ में, हम उससे कभी अलग नहीं होते। बस, इंद्रिय जगत का अनुभव करते हुए हम भूल जाते हैं कि हम वास्तव में कौन हैं। दूसरा, इस बात का कोई उत्तर नहीं है कि आत्मा इंद्रियों को क्यों आकर्षित करती है और सुख-दुःख के चक्कर में क्यों पड़ जाती है। इसलिए यह बस एक लीला है और यही जीवन है।हमारी सामान्य समझ यह है कि इन्द्रियाँ बहुत शक्तिशाली होती हैं और हमें उन पर नियंत्रण करना सीखना चाहिए। हालाँकि, श्रीकृष्ण एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, जब वे कहते हैं कि ये इन्द्रियाँ सबसे पहले आत्मा द्वारा प्रकाशित होती हैं। एक बार जब वे अपनी इंद्रियों के विषयों से मिलती हैं, तो वे सुख और दुःख के द्वंद्वों का निर्माण करने के लिए बाध्य हो जाती हैं (2.14)। लक्ष्य इस आसक्ति को समाप्त करना और इंद्रियों का स्वामी बननाहै ताकि उनका उपयोग किसी अन्य उपकरण की तरह किया जा सके।


210. उनके धाम की कुंजियाँ
210. उनके धाम की कुंजियाँ episode artwork
#210
01/28/2026

श्रीकृष्ण कहते हैं, "वे जो अभिमान और मोह से मुक्त हो गए हैं, जिन्होंने आसक्ति की बुराइयों पर विजय पा ली है, जो निरंतर अपनी आत्मा और भगवान में लीन रहते हैं, जिनकी कामनाएँ पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं और सुख-दुःख के द्वन्द्वों से परे हैं, ऐसे मान और मोह रहित ज्ञानीजन मेरे शाश्वत धाम को प्राप्त करते हैं" (15.5)।मूलतः, ये उनके धाम में पहुँचने के गुण हैं और यदि एक बार हम इनकोप्राप्त कर लेते हैं, तो हम उनके धाम में होते हैं। एक और संकेत यह है कि उनका धाम कहीं बाहर नहीं है, बल्कि अंदर ही है, जिसे खोजा जाना बाकी है।श्रीकृष्ण ने उन गुणों का वर्णन किया है जो हमें उनके धाम की यात्रा में मार्गदर्शक मील के पत्थरों के रूप में सहायता कर सकते हैं। मैत्रीपूर्ण और दयालु होना; ममत्व रहित और निर्-अहंकार; किसी भी प्राणी से द्वेष न रखना; सुख-दुःख में समभाव रखना (सम-सुख-दुःख) और क्षमाशील होना (क्षमाशील); सदैव संतुष्ट और व्याकुलता से मुक्त रहना; ईर्ष्या, भय और चिंता से मुक्त रहना; सभी कार्यों में अपेक्षाओं और स्वार्थ से मुक्त रहना (12.13 से 12.16); विनम्र और क्षमाशील होना; इंद्रिय विषयों के प्रति वैराग्य; वांछनीय और अवांछनीय परिस्थितियों के प्रति अनासक्ति और शाश्वत समभाव (13.8-13.12) इनमें सम्मिलित हैं ।श्रीकृष्ण आगे कहते हैं, "न तो सूर्य, न ही चंद्रमा, और न ही अग्नि मेरे उस परम धाम को प्रकाशित कर सकते हैं, जहाँ जाने के बाद, कोई कभी वापस नहीं आता" (15.6)।किसी न किसी रूप में, हम सभी उनके धाम के मार्ग पर हैं क्योंकि हम सभी उस आनंद, तृप्ति और मुक्ति की खोज में हैं। हमारी सामान्य मान्यता यह है कि उनके आशीर्वाद से हम अपनी इच्छाओं की पूर्ति कर सकते हैं और संपत्ति, सफलता, नाम और प्रसिद्धि के माध्यम से आनंद को अधिकतम कर सकते हैं। हालाँकि, प्रत्येक सुख के बाद दुःख अवश्य आता है, जिसके परिणामस्वरूप दोनों के बीच निरंतर झूलना पड़ता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि द्वंद्वों से मुक्ति उनके धाम की पहचान है। उनके धाम तक पहुँचना कुछ और नहीं बल्किइच्छाओं का त्याग और सुख-दुःख आदि द्वंद्वों से ऊपर उठना है, जो आनंदमय जीवन है।


209. अनासक्ति की कुल्हाड़ी
209. अनासक्ति की कुल्हाड़ी episode artwork
#209
01/25/2026

श्रीकृष्ण ने जीवन के उल्टे वृक्ष की बात की, जहाँ मनुष्य नीचे की ओर लटकती कर्म रूपी जड़ों से बंधा हुआ है। श्रीकृष्ण हमें तुरंत इस बन्धन से मुक्त होने के लिए 'अनासक्ति की कुल्हाड़ी' का प्रयोग करने की सलाह देते हैं (15.3)।अनासक्ति भगवद्गीता के मूलभूत सिद्धांतों में से एक है। श्रीकृष्ण ने कईअवसरों पर इस शिक्षा का उल्लेख किया है। मोटे तौर पर, हम लोगों, वस्तुओं, भावनाओं, विचारों और विश्वासों से आसक्त होते हैं। हमारी कई मान्यताएँ अवैज्ञानिक मिथकों, तर्कहीन मान्यताओं या अपुष्ट सूचनाओं पर आधारित होती हैं। एक अच्छा शिक्षार्थी बनने के लिए श्रीकृष्ण के द्वारा बताए गए 'प्रश्न पूछने' के गुण को विकसित करके, व्यक्ति उनसे अनासक्ति प्राप्त कर सकता है (4.34)। जबकि हमें अनासक्ति के बारे में बताया जाता है, हम विरक्ति यायहाँ तक ​​कि घृणा की ओर आकर्षित होता है। इसीलिए श्रीकृष्ण ने हमेंस्पष्ट रूप से घृणा त्यागने के लिए कहा है।हमें आसक्ति से छुटकारा पाना बहुत मुश्किल लगता है क्योंकि यह लंबे समय से हमारे द्वारा पोषित की गई है और यह हमारा एक हिस्सा बन जाती है। इसका मूल संदेश यह है कि आसक्ति को त्यागना है, लेकिन वस्तुओं और संबंधों को तोड़ना नहीं है। वास्तव में, इसका अर्थ है किसी भी परिस्थिति में आसक्ति के बिना अपना सर्वश्रेष्ठ करना।श्रीकृष्ण कहते हैं, "इस अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष का वास्तविक स्वरूप, इसका आदि, इसका अंत और इसकी निरंतरता के रूप - इनमें से कुछ भी सामान्य मनुष्य नहीं समझ सकता। अनासक्ति की प्रबल कुल्हाड़ी से इसे काटकर इस वृक्ष के मूल को खोजना चाहिए, जो कि परमेश्वर हैं, जिनसे बहुत समय पहले ब्रह्माण्ड की गतिविधियाँ प्रवाहित हुई थीं। उनकी शरण में आने पर, मनुष्य इससंसार में पुनः नहीं लौटेगा" (15.3 और 15.4)।एक बार जब कोई अनासक्ति की कुल्हाड़ी से लैस हो जाता है, तो वृक्ष के मूल अर्थात् परमात्मा की खोज शुरू हो जाती है।


208. जीवन का उल्टा वृक्ष
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#208
01/19/2026

भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय को 'पुरुषोत्तम योग' कहा जाता है। श्रीकृष्ण इस अध्याय का प्रारम्भ उल्टे जीवन वृक्ष का वर्णन करते हुए कहते हैं, "ज्ञानी लोग एक शाश्वत अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष की चर्चा करते हैं, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर और शाखाएँ नीचे की ओर होती हैं, और जिसके पत्ते वेदों के मंत्र हैं। जो इस वृक्ष को जानता है, वही वास्तव में वेदों का ज्ञाता है (15.1)। तीनों गुणों से पोषित, इस वृक्ष की शाखाएँ ऊपर और नीचे की ओर फैली हुई हैं; इसकी कोमल कोपलें इंद्रिय विषय हैं; इसकी जड़ें नीचे की ओर फैली हुई हैं, जो मनुष्यों को कर्म से बाँधती हैं" (15.2)।सबसे पहले, जो लोग इस वृक्ष को जानते हैं, उन्हें वेदों का ज्ञान प्राप्त होता है। वेदों का शाब्दिक अर्थ है ज्ञान। एक संभावित व्याख्या यह है कि वेदों द्वारा प्रस्तुत ज्ञान को प्राप्त करने के लिए उन्हें पढ़ने का कष्ट उठाने की आवश्यकता नहीं है। एक बार जब इस जीवन-वृक्ष को अस्तित्वगत स्तर पर समझ लिया जाता है, तो वही ज्ञान प्राप्त हो जाता है।दूसरे, अश्वत्थ का अर्थ है ‘वह जो कल भी एक सा नहीं रहता।’ लेकिन वृक्षको शाश्वत बताया गया है। यह कुछ विरोधाभासी प्रतीत होता है, जैसे प्रकाश का तरंग–कण द्वैत (wave–particle duality) का विरोधाभास। मूलतः, वृक्ष शाश्वत और परिवर्तन दोनों का मिश्रण है। आगे के श्लोकों में और स्पष्टता आएगी।अंततः, यह रूपक हमें अपने आस-पास की दुनिया के बारे में अपनीसोच को बदलने में मदद करेगा। हमारे विचार में प्रगति का अर्थ है शक्ति और प्रसिद्धि के मामले में कुछ उच्चतर प्राप्त करना; अधिक संपत्ति प्राप्त करना।हम आध्यात्मिक प्रगति के बारे में भी ऐसा ही सोचते हैं। यह रूपक इंगित करता है कि उच्च आध्यात्मिक प्रगति का अर्थ है जड़ों की ओर लौटना। यह त्यागने के बारे में है न कि प्राप्त करने के बारे में; यह हमारे जीवन के दौरान बने तंत्रिका प्रतिरूपों को तोड़ने जैसा है; यह एक नमक की गुड़िया की तरह है जो समुद्र के साथ एक होने के लिए खुद को विलीन कर रही है। मूलतः, हमें उस धूल को हटाना है जो हमने लंबे समय से जमा की है।


207. एकनिष्ठ भक्ति
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#207
01/14/2026

भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय को ‘गुण त्रय विभाग योग’ कहा जाता है, जिसमे गुणों और गुणातीत की व्याख्या की गई है। श्रीकृष्ण इस अध्याय का समापन गुणों से परे जाने का उपाय बताते हुए करते हैं और कहते हैं, "जो लोग अनन्य (अव्यभिचारेण) भक्ति के साथ मेरी सेवा करते हैं, वे तीनों गुणों से ऊपर उठकर ब्रह्म (गुणातीत) के स्तर पर पहुँच जाते हैं (14.26), क्योंकि मैं ही उस निराकार ब्रह्म का आधार हूँ जो अमर, अविनाशी, शाश्वत धर्म और असीम दिव्य आनंदस्वरूप है” (14.27)। श्रीकृष्ण 'व्यभिचारेण' शब्द का प्रयोग करते हैं, जिसका अर्थ है अनेक इच्छाएँ। 'अव्यभिचारेण भक्ति' एकनिष्ठ भक्ति है। इसी संदर्भ में, श्रीकृष्ण ने इसे इंगित करने के लिए 'अवेश्य' का प्रयोग किया (12.2)। मूलतः, यह अनेक मनों से परे होकर ईश्वर के प्रति एकनिष्ठ भक्ति है जो हमें गुणातीत बना देगा।सबसे पहले, गुणातीत यह समझकर कर्तापन का भाव त्याग देता है कि किसी भी कर्म का कोई कर्ता नहीं है और सभी कर्म विभिन्न गुणों के परस्पर प्रक्रिया का परिणाम हैं।दूसरे, उसे यह बोध हो जाता है कि दूसरे भी अपने द्वारा किए गए किसी भी कर्म के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। परिणामस्वरूप, वह सम्मान या अपमान से प्रभावित नहीं होता, क्योंकि दोनों ही गुणों की परस्पर क्रिया है, जिसका परिणाम शत्रुता का त्याग है।अंततः, उसे यह बोध होता है कि सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण सुखद और अप्रिय परिस्थितियाँ उत्पन्न करने में सक्षम हैं। अतः, वह अब ऐसीपरिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता। इसी प्रकार, वह प्रशंसा और आलोचना से भी प्रभावित नहीं होता, क्योंकि वह समझता है कि ये गुणों के कारणहोते हैं। गुणातीत की यह अवस्था आनंद की अवस्था है और यही हम सभी के जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।


206. गुणातीत का आचरण
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#206
01/04/2026

श्रीकृष्ण गुणातीत के आचरण के बारे में बताते हैं जो प्रकृति के तीन गुणों से ऊपर उठ गए हैं और कहते हैं, “वे जो सुख और दुःख में समान रहते हैं;जो आत्मा में स्थित हैं; जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने के टुकड़े को समान मानते हैं; जो सुखद और अप्रिय घटनाओं में एक समान रहते हैं; जो बुद्धिमान हैं, जो निन्दा और प्रशंसा दोनों को समभाव से स्वीकार करते हैं; जो सम्मान और अपमान में एक समान रहते हैं; जो मित्र और शत्रु दोनों के साथ समान व्यवहार करते हैं; और जिन्होंने कर्तापन के सभी मोहों को त्याग दिया है - वे तीनोंगुणों से ऊपर उठ गए हैं" (14.24 और 14.25)। संकेत यह है कि गुणातीत समदर्शी होने के साथ-साथ द्वन्द्वातीत भी है। जब इन्द्रियाँ इंद्रिय विषयों से मिलती हैं तो हमारे अंदर सुख और दुःख के द्वंद्व उत्पन्न होते हैं। श्रीकृष्ण ने पहले सलाह दी थी कि इन्हें अनदेखा करना सीखें क्योंकि ये क्षणिक हैं (2.14)। जीवन के अनुभव हमें बताते हैं कि द्वंद्व न केवल क्षणिक होते हैं बल्कि समय के साथ अपना स्वभाव भी बदलते हैं। विवाह का सुख तलाक के दुःख में बदल सकता है; एक मित्र शत्रु में बदल सकता है। जब हम अच्छे और बुरे; सुखद और अप्रिय द्वंद्वों का सामना करते हैं, उस समय समभाव बनाए रखना है। जबकि घटनाएं प्रकृति में घटित होती हैं, हम उन्हें सुखद या दुःखद परिस्थितियों के रूप में व्याख्यायित करते हैं। हम दूसरों  के शब्दों को प्रशंसा या आलोचना के रूप में ग्रहण करते हैं, और परिवार तथा कार्यस्थल में अपनी इच्छाएँ पूरी करने के लिए प्रशंसा और आलोचना - दोनों को साधन के रूप में उपयोग करते हैं। मूलतः, यह अपनी व्याख्याओं और मान्यताओं को त्यागने के बारे में है।भगवद्गीता प्राथमिक कक्षा से लेकर स्नातकोत्तर तक की पाठ्यपुस्तक है। ये श्लोक शुरुआती बच्चों के लिए भी समझने में बहुत आसान हैं। परंतु मूल बात यह है कि हम प्रत्येक परिस्थिति का विश्लेषण करके, और उन पूर्व अनुभवों पर मनन करके - जब हम प्रशंसा या आलोचना, सम्मान या अपमान से प्रभावित हुए थे - इन अंतर्दृष्टियों को अस्तित्वगत स्तर पर आत्मसात करें। हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि प्रत्येक परिस्थिति को श्रीकृष्ण की लीला के रूप में देखना चाहिए।


205. गुण- दासता से प्रभुत्व तक
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#205
12/31/2025

यह समझाने के बाद कि सत्व, रजस् और तमस् नामक तीन गुण आत्मा को भौतिक शरीर से बांधते हैं, श्रीकृष्ण इन गुणों को पार करके गुणातीत या निर्गुण बनने के लिए कहते हैं। अर्जुन ने तुरंत पूछा कि इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष के लक्षण क्या हैं, उसका आचरण कैसा होता है और वह इन तीनोंगुणों से कैसे परे जाता है (14.21)।श्रीकृष्ण कहते हैं, "तीनों गुणों से अतीत मनुष्य सत्वगुण से उत्पन्न प्रकाश, रजोगुण से उत्पन्न कर्म, और तमोगुण से उत्पन्न मोह के उपस्थित होने पर उनसे घृणा नहीं करते और अनुपस्थित होने पर उनकी लालसा नहीं करते (14.22)। वे उदासीन रहते हैं, गुणों से विचलित नहीं होते; वे यह जानकर कि सृष्टि में केवल गुण ही कार्यरत हैं, आत्मा में दृढ़ और केंद्रित रहते हैं” (14.23)। यह न तो गुणों की किसी भी अभिव्यक्ति के साथ लगाव (राग या आसक्ति) है और न ही वैराग्य (विराग या विरक्ति) है। श्रीकृष्ण ने ऐसी शाश्वत स्थिति का वर्णन करने के लिए वीतराग या अनासक्ति का उपयोग किया था। दूसरे, ऐसीपरिस्थिति में, श्रीकृष्ण ने इससे पहले हमें घृणा का त्याग करने की सलाह दी थी, लेकिन कर्म का नहीं। तीसरा, यह गुणों को अपना दास बनाने के बारे में है। जब हमें सोने की आवश्यकता हो, तो तमोगुण का आह्वान करें; जब हमें कोई कार्य करना हो, तो रजोगुण का उपयोग करें; सीखने के लिए सत्वगुण का प्रयोग करें। यह दासता की अवस्था से गुणों के प्रभुत्व की ओर बढ़ना है।उस अवस्था में, व्यक्ति को यह बोध होता है कि इन तीनों गुणों के अलावा कोई कर्ता नहीं है। इन तीनों के बीच की परस्पर क्रिया ही कर्म का कारण बनती है,लेकिन यह हमारे या किसी और के कारण नहीं होता।एक मार्ग है कर्म को कर्मफल से अलग करना, यह समझकर कि कर्मफल कई कारकों पर निर्भर करता है। दूसरा है कर्ता को कर्म से अलग करना,यह समझकर कि तीनों गुण ही वास्तविक कर्ता हैं। दोनों ही मार्ग निर्-अहंकार (मैं कर्ता हूँ की भावना से मुक्ति) की ओर ले जाते हैं। इस प्रकार व्यक्ति स्वयं में केंद्रित होता है और श्रीकृष्ण ने इसे आत्मरमण या नित्यतृप्त (सदैवसंतुष्ट) कहा है।


122. 'అంతా ఆయనే' అనే మంత్రం
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#122
12/22/2025

పరమాత్ముని రూపంలో ఉన్న శ్రీకృష్ణుడు, "సకల ప్రాణులయందును ఆత్మరూపముననున్న నన్ను (వాసుదేవుని) చూచుపురుషునకు, అట్లే ప్రాణులన్నింటిని నాయందు అంతర్గతములుగా ఉన్నట్లు చూచువానికి నేనుఅదృశ్యుడుని కాను, అతడును నాకు అదృశ్యుడు కాడు" అనిచెప్పారు (6.30). ఈ శ్లోకం భక్తి యోగానికి పునాది, ఇక్కడఅభ్యాసకులు ప్రతిచోటా మరియు ప్రతి పరిస్థితిలోనూ పరమాత్మను దర్శించగలుగుతారు.'అంతా అయనే' అనే మంత్రంలో, 'అంతా' అనేదిఒక వ్యక్తి లేదా వస్తువు లేదా పరిస్థితి కావచ్చు. ఈ మంత్రాన్ని పునరావృతం చేస్తూ, ఈ విషయము గురించి లోతైన అవగాహన కలిగితే అది అద్భుతాలు సృష్టిస్తుంది. ఈ విషయాన్ని గుర్తించిన తర్వాత మిత్రుడులోనైనా, శత్రువులోనైనా, సహాయం చేసినవారిలోను, కష్టాన్ని కలిగించినవారిలోను, పొగడ్తలోనూ, విమర్శలోనూ, బంగారంలోనూ, రాయిలోనూ లేదా అనుకూల ప్రతికూల పరిస్థితుల్లోనూ, సంతోషంలోనూ, ఆందోళనలోనూ,సంతృప్తిలోనూ, దు:ఖంలోనూ, జయాపజయాల్లోనూ పరమాత్మను చూడగలుగుతాము. ఒక్క మాటలో చెప్పాలంటే అన్నిపరస్పర విరుద్ధ అంశాలలో మనము పరమాత్మను దర్శించుకోగలుగుతాము.భక్తులు నన్ను సేవించిన రీతికి అనుగుణంగా నేను వారిని అనుగ్రహిస్తాను (4.11), నాకు అప్రియుడుకాని, ప్రియుడుకాని ఎవరూ లేరు (9.29) అని శ్రీకృష్ణుడు అంతకుముందు చెప్పారు.కానీ, "ప్రాణులన్నింటిని  నాయుందు అంతర్గతములుగా ఉన్నట్లు చూచువానికి నేను అదృశ్యుడని కాను, అతడును నాకు అదృశ్యుడు కాడు" (6.30) అనేది మనలోని విభజన యొక్క కొలమానాన్ని, పరమాత్మ నుండి మన దూరాన్ని సూచిస్తుంది అంతేకాని పరమాత్మ ఎవరినీ ద్వేషిస్తూన్నాడని కాదు.‘‘పరమాత్మను చేరుకున్నవాడు, సకల చరాచర జీవరాశిలలోనూనన్నే చూడగలిగినవాడు ఎటువంటి జీవనాన్ని కొనసాగించినా అతడి భక్తి శ్రద్దల్లో నేను కొలువుదీరి ఉంటాను’’ అని శ్రీకృష్ణుడు భరోసా ఇస్తున్నారు (6.31). దీని అర్ధం ఏమిటంటే మనం ఏమి చేస్తున్నాము, మన దగ్గర ఏమి ఉన్నది అన్నది ముఖ్యం కాదు. సకల చరాచర జీవరాశిలలో ఆ పరమాత్మను చూడటమే ముఖ్యం. భౌతిక ప్రపంచం సుఖదు:ఖాలనే పరస్పర విరుద్ధ అంశాలతో కూడుకుని ఉంటుంది. మన జీవన విధానం సంపన్న జీవితముఅయిననూ, కష్టాల జీవితము అయిననూ మనలను సుఖదు:ఖాలనే భావనలు ఆవహిస్తూ ఉంటాయి. కోపం, ఉద్వేగం,ఉద్రిక్తతలకు లోనవుతూనే ఉంటాము. అందుకే శ్రీకృష్ణుడు మనల్ని ఏకత్వములో స్థిరపడమని తద్వారా ఈ పరస్పర విరుద్ధ భానవల నుండి విముక్తులవమని బోధిస్తున్నారు.


204. मृत्यु के दो प्रकार
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#204
12/17/2025

श्रीकृष्ण कहते हैं, "जब बुद्धिमान व्यक्ति (द्रष्टा) यह देखते हैं कि सभी कार्यों में प्रकृति के तीनों गुणों के अलावा कोई कर्ता नहीं है और जो तीनों गुणों से अत्यन्त परे मुझ परमात्मा को तत्त्व से जानते हैं, वे मेरी दिव्य प्रकृति को प्राप्त करते हैं (14.19)। शरीर से संबद्ध तीन गुणों को पार करके गुणातीत होकर शरीरधारी जीव (देही) जन्म, मृत्यु, रोग, बुढ़ापे और दुःखों से मुक्त होकर अमरत्व (मोक्ष) को प्राप्त करता है” (14.20)। मूलतः, तीनों गुण ही कर्म के कर्ता या वास्तविक कर्ता हैं।मृत्यु को समझने का एक तरीका यह है कि जब शरीर किसी कारण से स्वचालितता बनाए रखने में असमर्थ हो जाता है, तो आत्मा का भौतिक शरीर से वियोग हो जाता है। इसके बाद, अमर आत्मा दूसरे शरीर में चली जाती है और यह चक्र चलता रहता है। इससे यह विश्वास उत्पन्न होता है कि हमारे जीवन के अकथनीय बुरे दौर पिछले जन्मों के बुरे कर्मों, पापों याअभिशापों का परिणाम हैं, और अच्छे दौर पिछले जन्मों के पुण्य कर्म हैं। आध्यात्मिक ग्रंथों में भी इसी प्रकार व्याख्या की गई है।दूसरे प्रकार की मृत्यु आत्मा का भौतिक शरीर से अलग होना है, जबकि शरीर अभी भी सक्षम और क्रियाशील है। इसे मोक्ष (जीवन मुक्ति) या आत्मज्ञान कहते हैं। यह वह अवस्था है जहाँ गुणों में आत्मा को भौतिक शरीर से बाँधनेकी क्षमता नहीं रह जाती। श्रीकृष्ण इस अवस्था को गुणों से परे होना कहते हैं और कहते हैं कि ऐसे लोग ईश्वर को प्राप्त कर लेते हैं। वे दुःखों से मुक्त हो जाते हैं और अमर हो जाते हैं।ये श्लोक स्पष्ट करते हैं कि कोई भी गुण न तो निम्न है और न ही उच्च। ये प्रकृति के गुण हैं जिनकी अलग-अलग विशेषताएँ हैं, लेकिन ये सभी आत्मा को शरीर से बांधते हैं। सार सभी गुणों से परे जाने का है। गुणातीत होना स्वस्थ होने के समान है, जबकि किसी भी गुण के प्रभाव में होना रोग से ग्रस्त होने के समान है। एक और निष्कर्ष यह है कि व्यक्ति किसी भी गुण से ऊपर उठकर गुणातीत की स्थिति में पहुँच सकता है। गुणों में कोई पदानुक्रम नहीं है, इसलिए हमें किसी क्रम का पालन करने की आवश्यकता नहीं है।


121. నమస్కారం యొక్క శక్తి
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#121
12/17/2025

భారతీయులు తారసపడినప్పుడు ఒకరికొకరు నమస్తే, సమస్కారం అని అభినందించుకుంటారు. 'నీలోని దైవత్వానికి వందనం' అన్నది ఈ పదానికి అసలైన అర్థం. విభిన్న సంస్కృతులలోని శుభాకాంక్షలు ఇదే విధమైన సందేశాన్ని అందిస్తాయి. "అన్నిజీవులలో తన ఆత్మను మరియు అన్ని జీవులని తన ఆత్మలో చూడటం మరియు ప్రతిచోటా అదే చూడటం" (6.29) అన్న శ్రీకృష్ణుడు ప్రభోధాన్ని ఆచరణలో పెట్టటడమే ఈ పదము యొక్క ప్రయోగం. ఈ అవగాహనతో మనము ఈ విధంగా పరస్పరం అభినందించుకున్నప్పుడు మనలోనూ, ఇతరుల్లోనూ ఉన్న దైవత్వాన్ని గ్రహించే దిశగా అడుగులు వేస్తున్నట్లే.
‘ప్రతిచోటా అదే చూడటం' అనేది నిరాకార మార్గం. ఇది కఠినమైన మార్గంగా పరిగణించబడినది. శ్రీకృష్ణుడు వెంటనే దానిని సులభతరం చేస్తూ ‘సర్వత్రా నన్నే చూడు, నాలోనే సర్వస్వాన్నీ చూడు’ (6.30) అని చెప్తున్నారు. ఇది 'రూపం' లేదాసాకార మార్గం. ఈ శ్లోకాలు 'సాకార' మరియు 'నిరాకార' మార్గాల ద్వారా పరమాత్మ ప్రాప్తిని పొందచేసే మార్గాలు. ప్రతి సంస్కృతీ పరమాత్మను చేరుకోవటానికి ఈ రెండింటిలో ఏదో ఒక మార్గాన్ని ప్రబోధిస్తుంది.అవ్యక్తం అనంతము, అపరిమితము కానీ భౌతికంగా వ్యక్తీకరించబడిన దానికి పరిధులు, పరిమితులు, విభజనలు, వర్గీకరణలూ ఉంటాయి. ఆత్మలోనే అన్నిటినీ చూడటం, అన్నిటిలోనూ ఆత్మను చూడటం అన్నది అవ్యక్తమైన ఆత్మతోఅనుబంధాన్ని పెంపొందించుకోవటమే. దీనిని సమృద్ధి లేదా సంతృప్త మనస్తత్వం అంటే విజయ-విజయ మనస్తత్వం అని కూడా అంటారు. అసంతృప్త మనస్తత్వం అనేది అందరికి నష్టాన్నితీసుకువచ్ఛేది.  గమనించదగ్గ విషయం ఏమిటంటే, అవ్యక్తమైన ఆత్మగురించి తెలుసుకున్న తర్వాత కూడా, వ్యక్త ప్రపంచములోనిప్రాథమిక మూలాంశములు మారవు. మనకు ఆకలి వేస్తుంది అందువల్ల మనుగడ సాగించుటకు మనము మన కర్మలు చేస్తూనే ఉండాలి (3.8). వీటిని ఇంతకుముందు శ్రీకృష్ణుడిచే కర్తవ్యకర్మలు(6.1) లేదా శాస్త్రవిహిత కర్మలని సూచించబడ్డాయి. ఇది వర్తమాన క్షణంలో మన కర్మలను మన సమర్ధత మేరకు చేయడం తప్ప మరొకటి కాదు. ఇది నాటకంలో పాత్ర పోషించడం లాంటిది.ఇందులో ఇతర కళాకారులు తమ పాత్రల ప్రకారం మన పాత్రను చేసే ప్రశంసలు మరియు విమర్శలు మనల్ని ప్రభావితం చేయని రీతిగా ఉంటుంది.


203. गुणों के पहलू
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#203
12/08/2025

श्रीकृष्ण कहते हैं, "जब देहधारी जीव सत्त्वगुण की प्रधानता में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब वह उत्तम ज्ञान वालों के शुद्ध लोकों को प्राप्त होता है(14.14)। जो व्यक्ति रजोगुण की प्रधानता में शरीर त्याग करता है, वह कर्मों में आसक्त लोगों के बीच जन्म लेता है। और जो तमोगुण में लीन होकर मृत्यु को प्राप्त होता है, वह मूढ़ (अविवेकी या अज्ञानमय) योनियों में जन्म लेता है"(14.15)। ​​श्रीकृष्ण ने पहले जीवन-मृत्यु-जीवन के बारे में समझाया था जहाँउन्होंने कहा था कि जब कोई मृत्यु के समय उनका स्मरण करता है तो वह उन तक पहुँच जाता है, लेकिन उन्होंने आगाह किया कि व्यक्ति अपने जीवनकाल में जो अभ्यास करता है, वही निर्धारित करता है कि उसकी मृत्यु के पश्चात क्या होगा (8.5 और 8.6)। यह इंगित करता है कि जीवन से मृत्यु और फिर जीवन में संक्रमण स्वाभाविक है, इसमें कोई विस्मय नहीं है। यदि किसी का जीवन सत्वगुण प्रधान है, तो संक्रमण सत्व के माध्यम से ही होगा। यही बात रजोगुण और तमोगुण के साथ भी लागू होती है। श्रीकृष्ण इन तीन गुणों के द्वारा उत्पन्न विभिन्न कर्मफलों का वर्णन करते हुए कहते हैं, "सत्वगुण का फल सद्भाव और पवित्रता है। रजोगुण का फल दुःख है। तामसिक कर्मों का फल अज्ञान है (14.16)। सत्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से लोभ और तमोगुण से भ्रम और अज्ञान पैदा होते हैं (14.17)। सत्वगुण में स्थित जीव ऊपर स्वर्गादि उच्च लोकों मे जाते हैं; रजोगुण में स्थापित पुरुष मध्य में पृथ्वीलोक पर ही रहते हैं और तमोगुण में स्थित पुरुष अधोगति की ओर जाते हैं" (14.18)। पुस्तक पढ़ने का उदाहरण हमें गुणों के संदर्भ में कर्मफल को समझने में मदद करेगा। जब हम सत्वगुण से प्रभावित होते हैं, तो हम ज्ञान और समझ प्राप्त करने के लिए कोई पुस्तक पढ़ते हैं। रजोगुण में रहते हुए हम अच्छे अंक पाने के लिए पढ़ते हैं जो तनाव पैदा करता है। तमोगुण में हम पुस्तक पढ़ते-पढ़ते सो जायेंगे।ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रत्येक गुण अपने तरीके से आत्मा को भौतिक शरीर से बांधता है। उपरोक्त श्लोक हमारे जीवनकाल के दौरान हमारे अंदर प्रबल गुण के आधार पर जीवन के विभिन्न पहलुओं की झलक देते हैं।


202. प्रभावशाली गुण की पहचान
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#202
12/02/2025

श्रीकृष्ण कहते हैं, "सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण नामक प्रकृति से उत्पन्न तीन गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बांधते हैं (14.5)। इनमें, सत्वगुण निर्मल होने के कारण आत्मा को सुख और ज्ञान के भावों के प्रति आसक्ति उत्पन्न करके उसे बन्धन में डालता है (14.6)। रजोगुण की प्रकृति इच्छा है। यह कामना और आसक्ति  को जन्म देता है और आत्मा को कर्म में बांधता है (14.7)। तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है और देहधारी जीवात्माओं में मोह का कारण है। तमोगुण सभी जीवों को असावधानी, आलस्य और निद्रा के द्वारा भ्रमित करता है" (14.8)।मूलतः, प्रकृति से उत्पन्न तीन गुण आत्मा को, जो कि परमात्मा का बीज है, भौतिक शरीर से बांधने के लिए उत्तरदायी हैं।श्रीकृष्ण आगे कहते हैं, "सत्वगुण सुख में बांधता है, रजोगुण कर्म में, जबकितमोगुण ज्ञान को ढककर आत्मा को प्रमाद में रखता है 14.9)। कभी-कभी सत्वगुण प्रबल होकर रजोगुण और तमोगुण पर हावी हो जाता है; कभी-कभी रजोगुण, सत्वगुण और तमोगुण पर हावी होता है; और कभी-कभी तमोगुण, सत्वगुण और रजोगुण पर हावी हो जाता है" (14.10)। इसका तात्पर्य यह है कि हम अलग-अलग समय पर इन गुणों के विभिन्न अनुपातों के संयोजन के प्रभाव में रहते हैं। जिस प्रकार तीन प्राथमिक रंग, लाल, पीला और नीला, मिलकर अनन्त रंग उत्पन्न करते हैं, उसी तरह ये तीन गुण हमारे आस-पास दिखाई देने वाले विविध व्यवहारों के लिए उत्तरदायी हैं।अगला प्रश्न है, यह कैसे पता चले कि किसी निश्चित समय पर कौन सा गुण हमें बाँध रहा है। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं, "जब सत्व गुण प्रबल होता है तो शरीर के सभी द्वार ज्ञान के प्रकाश से आलोकित हो जाते हैं (14.11)। जब रजोगुण प्रबल होता है तब लोभ, सकाम कर्म का प्रारम्भ, बेचैनी, अनियंत्रित इच्छा एवं लालसा के लक्षण प्रकट होते हैं (14.12)। तमोगुण जब हावी होता है तो अंधकार, जड़ता, असावधानी और भ्रम पैदा करता है" (14.13)। तमोगुण केहावी होने पर हम सो जाते हैं। रजोगुण हमें कर्म करने और सिद्धि के लिए प्रेरित करता है। सत्वगुण सीखने और ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरणादायी है। इसलिए, गुण ही हमसे उत्पन्न होने वाले प्रत्येक कार्य के वास्तविककर्ता हैं। जागरूकता मूलतः उस गुण को पहचानने की क्षमता है, सके नियंत्रण में हम किसी भी क्षण होते हैं।