Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
Main Dekh Raha Hun | Agyeya
मैं देख रहा हूँ । अज्ञेय
मैं देख रहा हूँ
झरी फूल से पँखुरी
- मैं देख रहा हूँ अपने को ही झरते।
मैं चुप हूँ :
वह मेरे भीतर वसंत गाता है।
Jism Kya Hai Rooh Tak | Adam Gondvi
जिस्म क्या है रूह तक । अदम गोंडवी
जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिये
आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिये
जो बदल सकती है इस पुलिया के मौसम का मिजाज़
उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये
जल रहा है देश यह बहला रही है क़ौम को
किस तरह अश्लील है कविता की भाषा देखिये
मतस्यगंधा फिर कोई होगी किसी ऋषि का शिकार
दूर तक फैला हुआ गहरा कुहासा देखिये
Yaad | Kailash Vajpeyi
याद । कैलाश वाजपेयी
जहाँ में नहीं गया
उन सभी देशों के
वे सारे फूल
मैं जिनके नाम नहीं जानता
जैसे वसंत की प्रतीक्षा किए बिना
खिल-खिल गए हों।
Kal Raat | Nida Fazli
कल रात । निदा फ़ाज़ली
कल रात
वो थका हुआ
चुप चुप
उदास उदास
सुनता रहा सड़क से गुज़रती बसों का शोर
पीपल का पत्ता टूट के दीवार ढा गया
आंतों का दर्द नींद की परियों को खा गया
झुँझला के उस ने चाँदी का दीपक बुझा दिया
आकाश को समेट के नीचे गिरा दिया
फैली हुई ज़मीं को धुएँ सा उड़ा दिया
फिर कुछ नहीं
न खेत, न मैदाँ, न रास्ते
बस इक निगाह
खिड़की की रंग-जालियाँ
(बस तीन चार आने की दो चार गोलियां)
Wo Zamana Guzar Gaya Kab Ka | Javed Akhtar
वो ज़माना गुज़र गया कब का । जावेद अख़्तर
वो ज़माना गुज़र गया कब का
था जो दीवाना मर गया कब का
ढूँढता था जो इक नई दुनिया
लूट के अपने घर गया कब का
वो जो लाया था हम को दरिया तक
पार अकेले उतर गया कब का
उस का जो हाल है वही जाने
अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का
ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा
अब कहाँ है बिखर गया कब का
Zinda Rahein To Kya Hai | Muneer Niyazi
ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या । मुनीर नियाज़ी
ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाए हम तो क्या।
दुनिया में ख़ामोशी से गुज़र जाए हम तो क्या।
हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने,
एक ख़्वाब हैं जहां में बिखर जाए हम तो क्या।
अब कौन मुंतज़िर (इंतज़ार करने वाला) है हमारे लिये वहाँ,
शाम आ गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या।
दिल की ख़लिश तो साथ रहेगी तमाम उम्र,
दरिया-ए-ग़म के पार उतर जाएँ हम तो क्या।
Nayi Sanskriti | Doodhnath Singh
नई संस्कृति । दूधनाथ सिंह
आसमान में बसा हुआ नगर
निर्वसन हवा को नींव में चुनवा कर,
आपस में टकराते, जूझते
मकान।
बँधे हुए कुत्तों का मुँह नोचते व्यवसायी
जूतों के तल्लों में सोना चिपकाए
कंधों पर लादे—
मसान।
बेतहाशा भागती हुई भीड़
अमर-बेलि की काली लतरों पर,
और दुहरे चुटीले अँधेरे में गुँथे हुए
पीली रोशनी के बियाबान।
ढेर-सा सवेरा—अलकतरे से पुती किवाड़ों की
फटी सनद में पिरोया-सा।
भीतर एक गाए गए मौसम, एक वेगातुर धर्म,
एक मर्यादित स्वार्थ की झूठी पहचान।
शिशिर के बूढ़े पर्दे के पीछे
ऋतुओं का एक ख़ाबगाह
सभी जगह कत्थक या गरबा की अनगिन मदमाती मुद्राएँ
और वसंत की ओस में नम एक सड़क का गुन-गुन गान।
फिर बहुत दिन बाद
नींव में मरी हुई
निर्वसन हवा...
टूटा हुआ नगर-कंकाल-आसमान।
अमर बेलि की काली लतरों पर
अँधेरी रोशनियों में उगते
जंगली पेड़ों की तरह
इंसान।
Maun | Arti Abodh
मौन । आरती अबोध
अर्धविकसित चेतना के बहेलिए ने
अव्यक्त आकांक्षाओं के मेरे मृग की हत्या कर दी
जिस संग मुझे मरने का सुख भोगना था
उसके न होने का संताप मेरी आत्मा में उतर आया
और इस तरह प्रेम में मेरी भाषा मौन बनकर बही।
Prem Ke Baare Mein Ek Shabd Nahi | Viren Dangwal
प्रेम के बारे में एक शब्द नहीं । वीरेन डंगवाल
शहद के बारे में
मैं एक शब्द भी नहीं बोलूँगा
वह
जो बहुश्रुत संकलन था
सहस्र पुष्प कोषों में संचित रहस्य रस का
जो न पारदर्शी न ठोस न गाढ़ा न द्रव
न जाने कब
एक तर्जनी की पोर से
चखी थी उसकी श्यानता
गई नहीं अब भी वह
काकु से तालु से
जीभ के बीचों-बीच से
आँखों की शीतलता में भी वही
प्रेम के बारे में
मैं एक शब्द भी नहीं बोलूँगा।
Ghar Ek Muktibodh-Numa Kavita Hai | Kumar Divyanshu Shekhar
घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है । कुमार दिव्यनशु शेखर
कुल जमा चार लोग रहते हैं
छुट्टियों में गिनती कुछ बढ़ जाती है
घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है।
अलग-अलग अँधेरे हिस्सो में
अपनी ही प्राणवायु के बीच साँय-साँय करते लोग
जोड़ रहे हैं लेखा-जोखा―'अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया!'
एक लड़का है जिसकी दाढ़ी सफेद हो रही है
मरम्मत करता रहता है पहिया वर्तमान का
हर बार जिस पर भूत की कील उभर आती है
धुरी में भविष्य छुपकर बैठ जाता है।
अलग-अलग अँधेरे हिस्सों में
चहारदीवारी के बाहर
लटके हैं― नरभक्षियों के मुंड
अपहरण करना चाहते हैं धुरी में छुपे भविष्य का।
घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है।
मुझे डर है―
वो लड़का जिसकी दाढ़ी सफेद हो रही है
बन न जाए ब्रह्मराक्षस...
Kharepan Ka Ehsaas | Kanhaiya Lal Nandan
खारेपन का अहसास । कन्हैयालाल नंदन
खारेपन का अहसास
मुझे था पहले से
पर विश्वासों का दोना
सहसा बिछल गया
कल,
मेरा एक समंदर
गहरा-गहरा सा
मेरी आंखों के आगे उथला निकल गया।
Khut Jayein | Nilesh Raghuvanshi
खुट जाएँ । नीलेश रघुवंशी
नए साल के आगमन पर पूछा गया सिंघाड़े बेचने वाली से
नए साल के बारे में क्या सोचा है तुमने
सिंघाड़े बेचती स्त्री ने कहा
नए साल में हम खुट जाएँ
खुट जाएँ मतलब..
खुट जाएँ मतलब खुट जाएँ याने हम मर जाएँ
ही ही हा हा ही हा
अरे अरे ए ऐसा नहीं कहते
हँसी ठसक से सिंघाड़े वाली मुश्किल से जबरिया हँसी को रोकती बोली
क्यों खुटने से डरते हो ???
हम तो रोज़ खुटते हैं…
Ek Baar | Rajula Shah
एक बार । राजुला शाह
बह जाने देना
उड़ जाने देना
अपने आप को
एक बार
तुम भी।
गुब्बारे-सा
हवा के बुलबुले-सा
हल्का होगा तुम्हारा मन
और कहीं भी जा सकेगा
बिला रोक-टोक
फिर-
प्रेम से इन्तज़ार में
इन्तज़ार से
मौन में
मौन से
निपट शून्य में
और तुम्हें लगेगा,
सबसे ताकतवर हो तुम
ऊपर और ऊपर
और ऊपर
उठते हुए....
Chandini | Ramvilas Sharma
चाँदनी । रामविलास शर्मा
चाँदी की झीनी चादर-सी
फैली है वन पर चाँदनी।
चाँदी का झूठा पानी है
यह माह-पूस की चाँदनी।
खेतों पर ओस-भरा कुहरा,
कुहरे पर भीगी चाँदनी;
आँखों में बादल-से आँसू,
हँसती है उन पर चाँदनी।
दु:ख की दनिया पर बुनती है
माया के सपने चाँदनी।
मीठी मुस्कान बिछाती है
भीगी पलकों पर चाँदनी।
लोहे की हथकड़ियों-सा दु:ख,
सपनों-सी झूठी चाँदनी;
लोहे से दु:ख को काटे क्या
सपनों-सी मीठी चाँदनी।
यह चाँद चुरा कर लाया है
सूरज से अपनी चाँदनी।
सूरज निकला, अब चाँद कहाँ?
छिप गई लाज से चाँदनी।
दु:ख और कर्म का यह जीवन,
वह चार दिनों की चाँदनी।
यह कर्म-सूर्य की ज्योति अमर,
वह अंधकार की चाँदनी।
Parcham | Kumar Ambuj
परचम। कुमार अम्बुज
वहाँ एक फूल खिला हुआ है अकेला
कोई उसे छू भी नहीं रहा है
किसी सुबह शाम में वह झर जाएगा
लेकिन देखो, वह खिला हुआ है
बारिश, धूल और यातनाओं को और ऋतुओं को जज़्ब करते हुए
एक पत्थर भी है वहाँ किसी की प्रतीक्षा में
आसपास की हर चीज़ इशारा करती है
तालाब किनारे अँधेरी झाड़ियों में चमकते हैं जुगनू
दुर्दिनों के किनारे शब्द
मुझे प्यास लग आयी है और यह सपना नहीं है
जैसे पेड़ की यह छाँह मंज़िल नहीं
यह समाज जो आख़िर एक दिन आज़ाद होगा
उसकी संभावना मरते हए आदमी की आँखों में है
और असफलता मृत्यु नहीं है
यह जीवन है, धोखेबाज़ पर भी मुझे विश्वास करना होगा
निराशाएँ अपनी गतिशीलता में आशाएँ हैं
'मैं रोज़ परास्त होता हूँ'-
इस बात के कम से कम बीस अर्थ हैं
यों भी एक-दो अर्थ देकर
टिप्पणीकार काफ़ी कुछ नक़सान पहुँचा चुके हैं
गणनाएँ असंख्य को संख्या में न्यून करती चली जाती हैं
सतह पर जो चमकता है वह परावर्तन है
उसके नीचे कितना कुछ है अपार
शांत, चपल और भविष्य से लबालब भरा हुआ।
Buri Aurat Ke Sapnon Mein | Kailash Manhar
बुरी औरत के सपनों में । कैलाश मनहर
बुरी औरत के सपनों में
नहीं होता पति और चरित्र और मर्यादाएँ
बन्द खिड़कियों वाला पिंजरेनुमा घर
बुरी औरत के सपनों में नहीं होती
बदन को धरती बनाकर
धान कुटवाने वाली निर्जीव सहन-शक्ति
बचपन के प्रेम को भूल जाने वाला
परिवार की प्रतिष्ठा के नाम का
पाखण्ड-पर्व
कभी नहीं होता बुरी औरत के सपनों में
दुनियादारी के घुटते हुए अँधेरे की
चहारदीवारी में
आत्महत्या का अनायास आदर्श नहीं होता
बुरी औरत के सपनों में।
बुरी औरत के सपनों में आता है
एक स्वच्छन्द बहती हुई नदी का दृश्य
और मनचाहे फूल पर बैठती हुई
तितली के पंख
बुरी औरत के सपनों में
बार-बार आता है जिबह करने को
लाया जाता ख़ूबसूरत मेमना
उसके स्वच्छन्द बहते रंगों पर
टपक जाते हैं
किसी निर्दोष आत्मा के पवित्र
प्रेमाश्रु
बुरी औरत के सपनों में उबलता है
बुरे लोगों के बुरे कामों के विरूद्ध
हृदय का लावा ।
Prem Ki Anivaaryata | Hemant Deolekar
प्रेम की अनिवार्थता । हेमंत देवलेकर
बहुत असंभव-से आविष्कार किए प्रेम ने
और अंततः हमें मनुष्य बनाया
लेकिन अस्वीकार की गहरी पीड़ा
उस प्रेम के हर उपकार का
ध्वंस करने पर तुली
दिया जिसने
सब कुछ न्यौछावर कर देने का भोलापन,
तर्क न करने की सहजता
और रोने की मानवीय उपलब्धि
प्रेम ने हमारी ऊबड़ - खाबड़, जाहिल-सी
भाषा को कविता की कला सिखाई
और ज़िन्दगी के घोर कोलाहल में
एकांत की दुआ मांगना
संभव नहीं था प्रेम के बिना
सुंदरता का अर्थ समझना
प्रेम होना ही सबसे बड़ी सफलता है
कोई असफल कैसे हो सकता है प्रेम में ...
Sandhya Vandana | Sumitranandan Pant
सांध्य वंदना । सुमित्रानंदन पंत
जीवन का श्रम ताप हरो हे!
सुख सुषुमा के मधुर स्वर्ण हे!
सूने जग गृह द्वार भरो हे!
लौटे गृह सब श्रान्त चराचर
नीरव, तरु अधरों पर मर्मर,
करुणानत निज कर पल्लव से
विश्व नीड प्रच्छाय करो हे!
उदित शुक्र अब, अस्त भनु बल,
स्तब्ध पवन, नत नयन पद्म दल
तन्द्रिल पलकों में, निशि के शशि!
सुखद स्वप्न वन कर विचरो हे!
Aaj Shaam Hai Bahut Udaas | Bhagwati Charan Verma
आज शाम है बहुत उदास । भगवतीचरण वर्मा
आज शाम है बहुत उदास
केवल मैं हूँ अपने पास ।
दूर कहीं पर हास-विलास
दूर कहीं उत्सव-उल्लास
दूर छिटक कर कहीं खो गया
मेरा चिर-संचित विश्वास ।
कुछ भूला सा और भ्रमा सा
केवल मैं हूँ अपने पास
एक धुन्ध में कुछ सहमी सी
आज शाम है बहुत उदास ।
एकाकीपन का एकान्त
कितना निष्प्रभ, कितना क्लान्त ।
थकी-थकी सी मेरी साँसें
पवन घुटन से भरा अशान्त,
ऐसा लगता अवरोधों से
यह अस्तित्व स्वयं आक्रान्त।
अंधकार में खोया-खोया
एकाकीपन का एकान्त
मेरे आगे जो कुछ भी वह
कितना निष्प्रभ, कितना क्लान्त।
उतर रहा तम का अम्बार
मेरे मन में व्यथा अपार।
आदि-अन्त की सीमाओं में
काल अवधि का यह विस्तार
क्या कारण? क्या कार्य यहाँ पर ?
एक प्रश्न मैं हूँ साकार।
क्यों बनना? क्यों बनकर मिटना?
मेरे मन में व्यथा अपार
औ समेटता निज में सब कुछ
उतर रहा तम का अम्बार।
सौ-सौ संशय, सौ-सौ त्रास,
आज शाम है बहुत उदास।
जोकि आज था तोड़ रहा वह
बुझी-बुझी सी अन्तिम साँस
और अनिश्चित कल में ही है
मेरी आस्था, मेरी आस।
जीवन रेंग रहा है लेकर
सौ-सौ संशय, सौ-सौ त्रास,
और डूबती हुई अमा में
आज शाम है बहुत उदास।
Pin Bahut Saare | Kunwar Bechain
पिन बहुत सारे। कुँअर बेचैन
जिंदगी का अर्थ
मरना हो गया है
और जीने के लिये हैं
दिन बहुत सारे ।
इस
समय की मेज़ पर
रक्खी हुई
जिंदगी है 'पिन-कुशन' जैसी
दोस्ती का अर्थ
चुभना हो गया है
और चुभने के लिए हैं
पिन बहुत सारे।
निम्न-मध्यमवर्ग के
परिवार की
अल्पमासिक आय-सी
है जिंदगी
वेतनों का अर्थ
चुकना हो गया है
और चुकने के लिए हैं
ऋण बहुत सारे।
Baaghi Biyabaan Auratein | Aishwarya Tiwari
बागी बियाबान औरतें। ऐश्वर्या तिवारी
लोग कहते हैं
वो औरत है ही कहाँ,
ज़्यादा सही शब्द है
आफ़त।
उसके गले में कोई मंगलसूत्र नहीं,
एक सूखी नदी लटकी है
जिस पर कभी किसी ने नाव चलाने की ज़िद की थी
और आधे में ही डर गया।
वो हँसती है तो लगता है
जैसे किसी पुराने मकान की दीवार
अचानक गिर पडी हो -
लोग भागते हैं मलबा बचाने,
वो बस अपनी हँसी से धूल झाड़ती है।
उसकी देह पर कपड़े कम हैं,
किस्से ज़्यादा।
हर तह से कोई मर्द निकलता है
जो कभी उसे देवी बुलाता था,
कभी डायन,
और कभी 'दोस्त',
और हर नाम के साथ
उसके भीतर की मिट्टी और पत्थर
थोड़े-थोड़े हमेशा बदलते रहे हैं।
वो बियाबान है
क्योंकि उसने अपने भीतर की
हरी घास खुद उखाड़कर फेंक दी थी।
जिस दिन उसे समझ आया
कि लोग उसकी खूबसूरती पर नहीं,
उसकी "कमीज़ की आख़िरी बटन" पर
कविताएं लिखते हैं।
उस रात उसने अपने सीने पर हाथ रखकर कहा था
"ये दिल नहीं, अदालत है,
और आज से सिर्फ यहाँ एक ही मुकदमा चलेगा
ख़ुद बनाम दुनिया।"
वो चाय बनाते हुए भी
इंक़लाब सोचती है,
लोटे में पानी भरते हुए
आज़ादी मापती है,
और जब दुपट्टा झाड़ती है
तो जैसे सदियों की धूल
आसमान पर फेंक देती है
कोई तारा कम भी हो जाए,
तो उसे कोई परवाह नहीं।
उसकी चाल में बाज़ार की चालाकी नहीं,
कब्रिस्तान जैसी सच्चाई है -
शांत, साफ़, अन्तिम।
वो किसी की अमानत नहीं,
ना बाप की इज्ज़त,
ना पति की नाक,
ना प्रेमी का राज़
वो अपने ही गुनाहों की
इकलौती वारिस है -
गिनती भी खुद रखती है,
और माफ़ी भी खुद दे देती है।
लोग उसे "बागी" बुलाते हैं
क्योंकि वो "हाँ से पहले
"क्यों' पूछ लेती है,
"कब लौटोगे?" से पहले
"क्यों रहूं" सोच लेती है।
वो बियाबान है
पर सूखा नहीं।
उसके भीतर किसी पुराने मेहबूब की
भूली हुई ख़ुशबू बसी हुई है
कभी-कभी रात में
वो खुद से पूछती है -
"अगर मैं इतनी ही बुरी हूँ
तो मेरी आँख में पानी का एक कतरा
अब भी क्यों बाकी है?"
कोई जवाब नहीं देता।
बस उसकी परछाई
दीवार से उतरकर
उसके साथ बैठ जाती है।
दोनों मिलकर सिगरेट सुलगाती हैं,
एक ही धुए को भीतर खींचती हैं
फ़र्क़ बस इतना है,
कि एक की आँख में आँसू हैं,
और दुसरे की आँख में आग।
सुबह होते-होते
आग और आँसू
एक ही नमी में बदल जाते हैं।
और वो औरत,
जो शहर की नज़रों में
"बागी बियाबान" है,
अपने भीतर से
चुपचाप एक नन्हा सा बीज उठाती है,
ज़मीन में नहीं,
ज़ुबान पर बो देती है
ताकि अगली बार
जब वो बोले,
कोई फूल नहीं,
सीधा जंगल उगे।
Pyaar | Sarveshwar Dayal Saxena
प्यार । सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
इस पेड में
कल जहाँ पत्तियाँ थीं
आज वहाँ फूल हैं
जहाँ फूल थे
वहाँ फल हैं
जहाँ फल थे
वहाँ संगीत के
तमाम निर्झर झर रहे हैं
उन निर्झरों में
जहाँ शिला खंड थे
वहाँ चाँद तारे हैं
उन चाँद तारों में
जहाँ तुम थीं
वहाँ आज मैं हूँ
और मुझमें जहाँ अँधेरा था
वहाँ अनंत आलोक फैला हुआ है
लेकिन उस आलोक में
हर क्षण
उन पत्तियों को ही मैं खोज रहा हूँ
जहाँ से मैंने- तुम्हें पाना शुरु किया था!
Mera Uska Parichay Itna | Ansar Kambari
मेरा उसका परिचय इतना । अंसार कम्बरी
मेरा उसका परिचय इतना
वो नदिया है, मैं मरुथल हूँ।
उसकी सीमा सागर तक है
मेरा कोई छोर नहीं है।
मेरी प्यास चुरा ले जाए
ऐसा कोई चोर नहीं है।
मेरा उसका इतना नाता
वो ख़ुशबू है, मैं संदल हूँ।
उस पर तैरें दीप शिखाएँ
सूनी सूनी मेरी राहें।
उसके तट पर भीड़ लगी है
कौन करेगा मुझसे बातें।
मेरा उसका अंतर इतना
वो बस्ती है, मैं जंगल हूँ।
उसमें एक निरन्तरता है
मैं तो स्थिर हूँ जनम जनम से।
वो है साथ साथ ऋतुओं के
मेरा क्या रिश्ता मौसम से।
मेरा उसका जीवन इतना
वो इक युग है मैं इक पल हूँ।
Idhar Se Dekhein To Apna Makaan Lagta Hai | Shamsur Rehman Farooqi
इधर से देखें तो अपना मकान लगता है । शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
इधर से देखें तो अपना मकान लगता है
इक और ज़ाविए से आसमान लगता है
जो तुम हो पास तो कहता है मुझ को चीर के फेंक
वो दिल जो वक़्त-ए-दुआ बे-ज़बान लगता है
शुरू-ए-इश्क़ में सब ज़ुल्फ़ ओ ख़त से डरते हैं
अख़ीर उम्र में इन ही में ध्यान लगता है
सरकने लगती है तब ही क़दम तले से ज़मीन
जब अपने हाथ में सारा जहान लगता है
दो चार घाटियाँ इक दश्त कुछ नदी नाले
बस इस के बाद हमारा मकान लगता है
Hawa Jab Aayegi | Champa Vaid
हवा जब आएगी | चंपा वैद
हवा जल आएगी अकेली
बैठा लूँगी अपने पास
चले चलेंगे हम दोनों
उस कविता के पर्वत पर
उड़ते, पेड़ लगाते, एक हज़ार
चश्मों से एकत्रित कर जल
और सूरज के प्रबल प्रकाश
मैं भी धूप बटोरूँगी दिन भर
हवा तुम्हारे साथ
Lehron Ka Geet | Sumitranandan Pant
लहरों का गीत । सुमित्रानंदन पंत
अपने ही सुख से चिर चंचल
हम खिल खिल पडती हैं प्रतिपल,
जीवन के फेनिल मोती को
ले ले चल करतल में टलमल!
छू छू मृदु मलयानिल रह रह
करता प्राणों को पुलकाकुल;
जीवन की लतिका में लहलह
विकसा इच्छा के नव नव दल!
सुन मधुर मरुत मुरली की ध्वनी
गृह-पुलिन नांध, सुख से विह्वल,
हम हुलस नृत्य करतीं हिल हिल
खस खस पडता उर से अंचल!
चिर जन्म-मरण को हँस हँस कर
हम आलिंगन करती पल पल,
फिर फिर असीम से उठ उठ कर
फिर फिर उसमें हो हो ओझल!
Tabla | Vivek Nirala
तबला । विवेक निराला
किसी की खाल है
जो खींच कर मढ़ दी गई है
मढ़ी हुई है मृतक
की जीवन्त भाषा।
मृतक के परिजनों
का विलाप कस गया है
इस खाल के साथ।
वादक की फूँक से नहीं
खाल के मालिक की
आख़िरी साँस से
बज रही है वह बाँसुरी
जो सँगत पर है।
धा-धा-धिन-धा
और तिरकिट
के पीछे
एक विषादी स्वर है।
Prem Samandar | Pallavi Vinod
प्रेम समंदर। पल्लवी विनोद
प्रेम समंदर-सा ही है धरती पर
इतना कि सब डूब जाए
इतना कि प्यास ही ना बुझे
इतना कि डूबकर भी उतराता रहे
निकल बाहर फिर इसी में समाता रहे
प्रेम को पाना हो तो मछली बन जाना
सीपी बन जाना,
चाहें बन जाना कोई डूबा जहाज़
अगर मनुष्य बनोगे
तो समंदर आश्चर्य देगा
वैविध्य देगा
गहराई देगा
टापू देगा
बस ख़ुद को नहीं दे पाएगा।
Bilbilaata Surya | Wazda Khan
बिलबिलाता सूर्य। वाज़दा खान
डर और दबाव के
घटाटोप अनधकार में
बिलबिलाता सूर्य,
कितना भीतर से
जन्मा है सृष्टि के?
भरी दुपहरी के आखिरी पलों में भी
चढ़ नहीं पाया आकाश
बन जाता आकाश सुनहरा तो
सूर्य की रश्मियां अपराजेय हो जातीं
पहुंच जातीं उन नसों में
जहां डर, दबाव और ख़ून एकमेक होकर
बहता है।
Prem Ke Baare Mein | Savita Singh
प्रेम के बारे में । सविता सिंह
सिल्विया प्लाथ आओ
मेरी आत्मा में बसो
निश्चिंतता महसूस करो
यहाँ अकेलापन कोई यातना नहीं
जो ले जाए तुम्हें गैस स्टोव तक
नहीं प्रेम के बदले नहीं मिला प्रेम कोई महादुख
यहाँ जीवन की हल्की रोशनी में फूलों की तरह खिली हुई
मिलेंगी जीवन जीने की अमूल्य सलाहें अब
एक फूल जिनमें से तुम्हें भी जीवित करेगा
अपनी अद्भुत सुगंध से
आओ सिल्विया प्लाथ
मुझमें बसो
निश्चिंतता महसूस करो
यहाँ दूर-दूर तक कोई पुरुष तुम्हें
इतना बेबस नहीं कर सकेगा अपनी क्रूरता से
कि तुम नष्ट हो जाओ
अपने प्रेम से नहीं मार सकेगा वह तुम्हें दोबारा
आओ और अपनी बाक़ी कविताएँ लिखो
बताओ वह कैसी उदासी थी जिसे तुम झेल नहीं पाईं
डूब गई जिसमें अंततः
और यह भी कि अंत तक लगाते हुए आख़िरी ग़ोता
क्या सोचा था तुमने प्रेम के बारे में
Tumse Alag Hokar | Sarveshwar Dayal Saxena
तुमसे अलग होकर। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
तुमसे अलग होकर लगता है
अचानक मेरे पंख छोटे हो गए हैं,
और मैं नीचे एक सीमाहीन सागर में
गिरता जा रहा हूँ।
अब कहीं कोई यात्रा नहीं है,
न अर्थमय, न अर्थहीन;
गिरने और उठने के बीच कोई अंतर नहीं।
तुमसे अलग होकर
हर चीज़ में कुछ खोजने का बोध
हर चीज़ में कुछ पाने की
अभिलाषा जाती रही
सारा अस्तित्व रेल की पटरी-सा बिछा है
हर क्षण धड़धड़ाता हुआ निकल जाता है।
तुमसे अलग होकर
घास की पत्तियाँ तक इतनी बड़ी लगती हैं
कि मेरा सिर उनकी जड़ों से
टकरा जाता है,
नदियाँ सूत की डोरियाँ हैं
पैर उलझ जाते हैं,
आकाश उलट गया है
चाँद-तारे नहीं दिखाई देते,
मैं धरती पर नहीं, कहीं उसके भीतर
उसका सारा बोझ सिर पर लिए रेंगता हूँ।
तुमसे अलग होकर लगता है
सिवा आकारों के कहीं कुछ नहीं है,
हर चीज़ टकराती है
और बिना चोट किए चली जाती है।
तुमसे अलग होकर लगता है
मैं इतनी तेज़ी से घूम रहा हूँ
कि हर चीज़ का आकार
और रंग खो गया है,
हर चीज़ के लिए
मैं भी अपना आकार और रंग खो चुका हूँ,
धब्बों के एक दायरे में
एक धब्बे-सा हूँ,
निरंतर हूँ
और रहूँगा
प्रतीक्षा के लिए
मृत्यु भी नहीं है।
Gaon Dehaat Ki Betiyaan | Neera Parmar
गांव-देहात की बेटियां । नीरा परमार
लू के थपेड़े हाड़ कंपाते जाड़े
भरी बरसात में
जंगल-पहाड़ नदी-नाले को
लांघकर
स्कूल जाती हैं
दूर-दराज बियाबान में बसे
गांव-देहात की बेटियां
न तन ढंकने लायक कपड़े
न पैरों में ढंग की चप्पल
पौ फटते दो कौर बासी भात पेट में डाल
घर गृहस्थी छोटे भाई-बहन
मां-बाप के सौ टंटे बोरे
बदरंग तख्ती के संग
ब्लैकबोर्ड पर उभरते ककहरे से जोड़
नाता
अंधेरे में उम्मीद की कंदील
जलाती हैं!
Teddy Bear Main Bache Hue Bhalu | Gyanendrapati
टेडी बियर में बचे हुए भालू। ज्ञानेन्द्रपति
बच्चियाँ जब
अपने टेडी बियर को छाती से चिपकाए
दुलार रही होंगी
छीज रहे भारतीय जंगलों में
और खोजी दलों और अनुसंधान-स्टेशनों के
कचरालय बने जा रहे ध्रुवीय प्रदेशों में
बेमौत मारे जा रहे होंगे भालू
काले भालू और भूरे भालू
बगैर किसी रंग-भेद के
कौन मार रहा होगा उन्हें
अपने टेडी बियर को छाती से लगाए
सो जानेवाली बच्चियाँ
क्या कभी सपने में भी जान सकेंगी इसे
निहायत मुलायमियत से उनके आलिंगन से
छुल्लक भल्लूक को हटा उन्हें रजाई उढ़ानेवाले पापा
आज ही कहा था जिन्होंने-बेटे, पुराना पड़ गया है यह
कल ही बाजार से ला देंगे तुम्हारे लिए
एक नया टेडी बियर
प्यारा-सा टेडी बियर -
वही पापा
मदारियों से मुक्त करा
भालुओं को बरास्ते चिड़ियाखाना वापिस जंगल
भिजानेवाले मोह से भरे उनके पापा
शामिल हैं
उनके और अपने भी अनजाने
भालुओं के हत्यारों में
और बेहतर कि इसे कभी न जानें जंगली मधुमक्खियाँ
कि शहदखोर शहदचोर भालुओं के लिए विलाप-नृत्य करती हुई
भंभोड़ डालें बस्तियों पर बस्तियाँ
आत्मघाती अभियानों में
नहीं, नहीं जान सकेंगी बच्चियाँ इसे
और न जान पाएँगे उनके प्यारे पापा
और पीढ़ी-दर-पीढ़ी
जंगली प्रदेशों से और बर्फ़ानी प्रदेशों से अंततः मिट गए भालू
टेडी बियर बनकर दुकानों के शो केसों में वैठे रहेंगे अतीतातीत
वत्सल पिताओं की प्रतीक्षा में
मोहित बच्चियों की ममतालु बाँहों के बीच होगी उनकी अंतिम शरणस्थली
उनकी आत्मा को मिलेगा अभयारण्य
जहाँ माँ चिड़िया की तरह देह ही नहीं मन-प्राण की उष्मा से
सेयेंगे वे
वक्षांकुर
भविष्योन्मुख ।
Bachcha | Indu Jain
बच्चा । इन्दु जैन
औरत के सिर पर गठरी है
कमर पर बच्चा
मर्द हाथ में बक्सा
लटकाये है
बच्चा रो रहा है लगातार
हाथ-पाँव पटक रहा
बार-बार
औरत के समझाने
मर्द के झुँझलाने के बावजूद
वह पैर-पैर चलना
चाहता है
और
गठरी अपने सिर पर
उठाना चाहता है।
Kavitayein | Dharmesh
कविताएँ । धर्मेश
ख़त्म हो चुकी हैं कविताएँ
शब्दों ने कर ली है सामूहिक आत्महत्या
मजनूँ के क़त्ल हो जाने के डर से
लैला ने तिलांजलि दे दी है अपने प्रेम की
जंगल की हत्या पर आमादा शहर
चीर चुका है नदी का हृदय
सियारों को गाली देने वाले आदमी ने
नोच खाया है एक और आदमी को
मेरी आँखों में अब भी बचा है प्रेम
ये इस दुनिया की तबाही का सूत्र है
Angootha Chaap Neta | Kaka Hathrasi
अँगूठा छाप नेता । काका हाथरसी
चपरासी या कलर्क जब करना पड़े तलाश।
पूछा जाता—क्या पढ़े, कौन क्लास हो पास?
कौन क्लास हो पास, विवाहित हो या क्वारे।
शामिल रहते हो या मात-पिता से न्यारे?
कह ‘काका’ कवि, छान-बीन काफ़ी की जाती।
साथ सिफ़ारिश हो, तब ही सर्विस मिल पाती॥
कर्मचारियों के लिए, है अनेक दुख-द्वंद्व।
नेताजी के वास्ते, एक नहीं प्रतिबंध॥
एक नहीं प्रतिबंध, मंच पर झाड़े लेक्चर।
वैसे उनकी भैंस बराबर काला अक्षर॥
कह ‘काका’, दर्शन करवा सकता हूँ प्यारे।
एम.एल.ए. कई, ‘अँगूठा छाप’ हमारे॥
Bitiya Murmu Ke Liye | Nirmala Putul
बिटिया मुर्मू के लिए | निर्मला पुतुल
उठो कि अपने अँधेरे के ख़िलाफ़ उठो
उठो अपने पीछे चल रही साज़िश के ख़िलाफ़
उठो, कि तुम जहाँ हो वहाँ से उठो
जैसे तूफ़ान से बवण्डर उठता है
उठती है जैसी राख में दबी चिनगारी
देखो ! अपनी बस्ती के सीमान्त पर
जहाँ धराशाई हो रहे हैं पेड़
कुल्हाड़ियों के सामने असहाय
रोज़ नंगी होती बस्तियाँ
एक रोज़ माँगेगी तुमसे
तुम्हारी ख़ामोशी का जवाब
सोचो-
तुम्हारे पसीने से पुष्ट हुए दाने एक दिन लौटते हैं
तुम्हारा मुँह चिढ़ाते तुम्हारी ही बस्ती की दुकानों पर
कैसा लगता है तुम्हें जब
तुम्हारी ही चीज़ें
तुम्हारी पहुँच से दूर होती दिखती हैं ?
Santulan Ke Liye | Shayak Alok
संतुलन के लिए । शायक आलोक
वे जिस दुनिया में आए हैं वह है
एक हँसती खिलखिलाती दुनिया।
सब सुंदर है, लगे उन्हें
इसलिए मैं मुस्कुरा देता हूँ
नए बच्चों की तरफ़
आँखें मिचमिचा देता हूँ।
एक दुख की कथा से
दूसरे दुख के किरदार को मिलता है सहारा
इसलिए मैंने अपवित्र पवित्रताओं को जीवन में उतारा।
दुनिया के सार्वजनिक शोकागार में आँखें नम रखता हूँ
संतुलन के कई पाठ रचे
वे ही रहीं सबसे कम सुंदर स्त्रियाँ
जिन्हें मैं करता रहा दुनिया का सबसे अधिक प्रेम।
Koi Mere Saath Chale | Sarveshwar Dayal Saxena
कोई मेरे साथ चले। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
मैंने कब कहा
कोई मेरे साथ चले
चाहा ज़रूर!
अक्सर दरख्तों के लिये
जूते सिलवा लाया
और उनके पास खडा रहा
वे अपनी हरीयाली
अपने फूल फूल पर इतराते
अपनी चिडियों में उलझे रहे
मैं आगे बढ गया
अपने पैरों को
उनकी तरह
जडों में नहीं बदल पाया
यह जानते हुए भी
कि आगे बढना
निरंतर कुछ खोते जाना
और अकेले होते जाना है
मैं यहाँ तक आ गया हूँ
जहाँ दरख्तों की लंबी छायाएं
मुझे घेरे हुए हैं......
किसी साथ के
या डूबते सूरज के कारण
मुझे नहीं मालूम
मुझे
और आगे जाना है
कोई मेरे साथ चले
मैंने कब कहा
चाहा ज़रूर!
Ahaa Buddhimanon Ki Basti | Mahesh Anagh
अहा बुद्धिमानों की बस्ती । महेश अनघ
अहा बुद्धिमानों की बस्ती
या तो चुप्पी या तकरार -
कोने-कोने भूत बियाने
सारा घर सन्नाटेदार ।
सूचीबद्ध हुई दिनचर्या
मज़बूरी रेखांकित है
चौके से चूल्हे की अनबन
हर भांडा आतंकित है
किसी ख़ास दिन ख़ास वजह से
काग़ज़ पर लिखते हैं प्यार।
यों तो इस भुतहा बाखर में
कोई आएगा ही क्यों
जिस धन से ख़ुशबू ग़ायब है
उसे चुराएगा ही क्यों
फिर भी ताला है, कुत्ता है
और गोरखा चौकीदार ।
अपना क़द ऊँचा रखने में
झुक कर चलना छूट गया
विज्ञापन से जोड़ा रिश्ता
विज्ञापन से टूट गया
इतनी चीज़ें जुड़ीं कि हम भी
चीज़ों में हो गए शुमार ।