Pratidin Ek Kavita

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By: Nayi Dhara Radio

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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Bhram | Sushma Kumari
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#1256
Today at 12:30 AM

भ्रम ।  सुषमा कुमारी 


आसमान में अब बादल नहीं दिखता

दिखता है बादल के होने का एक भ्रम 

पेड़ों पर अब चिड़ियाँ नहीं रहती

रहता है उनके होने का एक भ्रम।

फूर्लों पर अब मधुमक्खियाँ नहीं होतीं

और सड़कों पर अब नहीं होते रास्ते!

इसी तरह

जंगल में अब जंगल नहीं बसता

थाली में नहीं होती रोटी

अख़बार में नहीं होता समाचार,

जीवन में नहीं होता प्रेम!

अब किसान की आत्मा में नहीं बची खेती

युवाओं के आँखों में नहीं बचे सपने

बच्चों के हा्थों में नहीं बचे खिलौने!

देश में अब नहीं बचा देश

आदमी में नहीं बचा थोड़ा-सा आदमी!

हमारे-तुम्हारे परिदृश्य में

इन दिनों बस बचा रह गया है

सबके होने का एक भ्रम!


हमारी-तुम्हारी कलाई पर बंधी घड़ी में

नहीं बचा अच्छा या बुरा समय!

हम विकास की दुनिया के

अभिमंत्रित लोग हैं

जिन्हें अपने ही परिदृश्य से

गायब होती चीज़ें

अब दिखाई नहीं देती!


Main Duniya Ki Haqeeqat Jaanta Hun | Naqsh Lyallpuri
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#1255
Yesterday at 12:30 AM

मैं दुनिया की हक़ीक़त जानता हूँ | नक़्श लायलपुरी


मैं दुनिया की हक़ीक़त जानता हूँ

किसे मिलती है शोहरत जानता हूँ


मिरी पहचान है शे'र-ओ-सुख़न से

मैं अपनी क़द्र-ओ-क़ीमत जानता हूँ


तेरी यादें हैं शब-बेदारियाँ हैं

है आँखों को शिकायत जानता हूँ


मैं रुस्वा हो गया हूँ शहर-भर में

मगर किस की बदौलत जानता हूँ


ग़ज़ल फूलों सी दिल सहराओं जैसा

मैं अहल-ए-फ़न की हालत जानता हूँ


तड़प कर और तड़पाएगी मुझ को

शब-ए-ग़म तेरी फ़ितरत जानता हूँ


सहर होने को है ऐसा लगे है

मैं सूरज की सियासत जानता हूँ


दिया है 'नक़्श' जो ग़म ज़िंदगी ने

उसे मैं अपनी दौलत जानता हूँ


Akoo (Main) | Khairul Anwar
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#1254
Last Saturday at 12:30 AM

अकू | ख़ैरुल अनवर

अनुवाद : जितेंद्र कुमार त्रिपाठी


अगर मेरा अंतिम समय आ जाए तो


मैं नहीं चाहूँगा कि कोई मुझे दिलासा दे

तुम भी नहीं


मुझे उन आँसुओं की ज़रूरत नहीं

मैं भेड़िया हूँ


अपने झुंड से अलग

चीरने दो गोलियों को मेरी चर्बी


मैं फिर भी डटा रहूँगा

घाव और विष दोनों ही


संग-साथ लेकर

दौड़ता रहूँगा


जब तक यह चुभता दर्द जाता नहीं

और किंचित ही परवाह किए बिना


मैं जीना चाहता हूँ

एक हज़ार साल और…


(अकू : इंडोनेशियाई भाषा में—मैं)


Barsaati Jhonka | Dharamvir Bharti
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#1253
Last Friday at 12:30 AM

बरसाती झोंका | धर्मवीर भारती


चूमता आषाढ़ की पहली घटाओं को,


झूमता आता मलय का एक झोंका सर्द;

छेड़ता मन की मुँदी मासूम कलियों को


और ख़ुशबू-सा बिखर जाता हृदय का दर्द!


Sabhi Ped Ek Phool Hain | Anurag Tiwari
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#1252
Last Thursday at 12:30 AM

सभी पेड़ इक फूल हैं।  अनुराग तिवारी 


सभी पेड़ इक फूल हैं 

जो प्रेम में दिए गए

उपहार हैं।

जिसे दिया होगा

एक प्रेमिका के रूप में

पृथ्वी ने

हाथ बढ़ा कर

अपने प्रेमी

आकाश को!

सभी नदियां इक लम्बा खत हैं

जिसे लिखा होगा

इस छोर की प्रेमिका ने

उस छोर के प्रेमी को

सुनो,

जो तुम फूलों को काट रहे हो

इस संवेदनहीन होती दुनिया में

प्रेम के लिए बढ़े हाथ को

काट रहे हो..

कभी क्षमा नहीं किए जाओगे!



Aisa Bhi Ho Sakta Hai | Balli Singh Cheema
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#1251
Last Wednesday at 12:30 AM

ऐसा भी हो सकता है |  बल्ली सिंह चीमा


साज़िश में वो ख़ुद शामिल हो, ऐसा भी हो सकता है,

मरने वाला ही क़ातिल हो, ऐसा भी हो सकता है ।


आज तुम्हारी मंज़िल हूँ मैं, मेरी मंज़िल और कोई,

कल को अपनी इक मंज़िल हो, ऐसा भी हो सकता है ।


साहिल की चाहत है लेकिन, तैर रहा हूँ बीचों-बीच,

मंझधारों में ही साहिल हो, ऐसा भी हो सकता है ।


तेरे दिल की धडकन मुझको लगे है अपनी-अपनी-सी,

तेरा दिल ही मेरा दिल हो, ऐसा भी हो सकता है ।


जीवन भर भटका हूँ ‘बल्ली’, मंज़िल हाथ नहीं आई,

मेरे पैरों में मंज़िल हो ऐसा भी हो सकता है ।



Kya Wo Din Bhi Din Hain | Rahi Masoom Raza
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#1250
Last Tuesday at 12:30 AM

क्‍या वो दिन भी दिन हैं  | राही मासूम रज़ा


क्‍या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए

क्‍या वो रातें भी रातें हैं जिनमें नींद ना आए।


हम भी कैसे दीवाने हैं किन लोगों में बैठे हैं

जान पे खेलके जब सच बोलें तब झूठे कहलाए।


इतने शोर में दिल से बातें करना है नामुमकिन

जाने क्‍या बातें करते हैं आपस में हमसाए।।


हम भी हैं बनवास में लेकिन राम नहीं हैं राही

आए अब समझाकर हमको कोई घर ले जाए ।।



Akanksha | Nandkishore Acharya
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#1249
08/31/2026

आकाँक्षा । नंदकिशोर आचार्य


एक अतीत रक्त की भाँति


प्रवाहित रहता है मुझमें

एक भविष्य ने साँसों की तरह


बाँध रखा है मुझे

और मैं - घड़ी को सुई -


भविष्य के अतीत में बदलने की

सूचना मात्र देता रह जाता हूँ।


क्या कभी नहीं हो सकता यह

एक पल के लिए ही सही


अतीत और भविष्य

मुझमें न मिल पाएँ


और तब मैं

मेरा सहारा लेने के लिए हाथ फैलाते


भयभीत ईश्वर

और मृत्यु को


शून्य में छटपटाते हुए

देख लूँ!



Tum Sudhi Ban Bankar Baar Baar | Bhagwati Charan Verma
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#1248
08/30/2026

 

तुम सुधि बन-बनकर बार-बार ।  भगवतीचरण वर्मा


तुम सुधि बन-बनकर बार-बार

क्यों कर जाती हो प्यार मुझे?

फिर विस्मृति बन तन्मयता का

दे जाती हो उपहार मुझे 

मैं करके पीड़ा को विलीन

पीड़ा में स्वियं विलीन हुआ

अब असह बन गया देवि,

तुम्हारी अनुकम्पा का भार मुझे 

माना वह केवल सपना था,

पर कितना सुन्दर सपना था

जब मैं अपना था, और सुमुखि

तुम अपनी थीं, जग अपना था 

जिसको समझा था प्यार, वही 

अधिकार बना पागलपन का

अब मिटा रहा प्रतिपल,

तिल-तिल, मेरा निर्मित संसार मुझे 



Gehri Raat Hai | Zeb Ghauri
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#1247
08/29/2026

गहरी रात है ।  ज़ेब ग़ौरी


गहरी रात है और तूफ़ान का शोर बहुत

घर के दर-ओ-दीवार भी हैं कमज़ोर बहुत

दर-ओ-दीवार: दरवाज़ा और दीवार


तेरे सामने आते हुए घबराता हूँ

लब पे तेरा इक़रार है दिल में चोर बहुत

इक़रार: स्वीकार करना


नक़्श कोई बाक़ी रह जाए मुश्किल है

आज लहू की रवानी में है ज़ोर बहुत

नक़्श: रेखाचित्र


दिल के किसी कोने में पड़े होंगे अब भी

एक खुला आकाश पतंगें डोर बहुत


मुझ से बिछड़ कर होगा समुंदर भी बेचैन

रात ढले तो करता होगा शोर बहुत


आ के कभी वीरानी-ए-दिल का तमाशा कर

इस जंगल में नाच रहे हैं मोर बहुत

वीरानी-ए-दिल: मन के वीरान होने की अवस्था


अपने बसेरे पंछी लौट न पाया 'ज़ेब'

शाम घटा भी उट्ठी थी घनघोर बहुत



Tadap Kar Jigar Munh Ko Aa Jaye Hai | Firaaq Gorakhpuri
Tadap Kar Jigar Munh Ko Aa Jaye Hai | Firaaq Gorakhpuri episode artwork
#1246
08/28/2026

तड़प कर जिगर मुँह को आ जाए है । फ़िराक़ गोरखपुरी


तड़प कर जिगर मुँह को आ जाए है


उसे देख कर कब रहा जाए है

किसू ने न अब तक बताया हमें


ग़म-ए-हिज्र में क्या किया जाए है

मोहब्बत में ऐ मौत ऐ ज़िंदगी


जिया जाए है या मरा जाए है

रुमूज़-ए-बहाराँ जो पूछो हो तुम


गुल अपने लहू में नहा जाए है

मुझे पा के तन्हा मिरी बेकसी


सर-ए-शाम बिस्तर लगा जाए है

मुझे गुमरही का नहीं कोई ख़ौफ़


तिरे घर को हर रास्ता जाए है



Dhat | Krishna Mohan Jha
Dhat | Krishna Mohan Jha episode artwork
#1245
08/27/2026

धत । कृष्णमोहन झा


चाय-बिस्कुट-नमकीन

धत

चुटकुलों और निन्दाओं और नक़ली ठहाको

धत

होड़ लेती विनम्रताओं और खोखली सुंदरताओं

धत

राजनीतिक रूप से सही कविताओं 

और पुरस्कार के लिए लार टपकाती जिह्वाओं

धत

बर्थडे-मैरेजडे-मदर्सडे-फ़ादर्सडे-चिल्ड्रेंसडे- टीचर्सडे-

हेल्थडे-ड्रायडे आदि

धत 

महँगाई-भत्ता और इन्क्रीमेंट

धत

 जीवनबीमा और मेडिकल इंश्योरेंस

धत

 होमलोन-आरडी-जीपीएफ-पीपीएफ

धत 

शर्मा-वर्मा-कुमार- गुप्ता-मिश्रा चौहान- राव-रंजन-झा इत्यादि


धत

रेंगने-रिरियाने की भाषा

धत एक कील में कब से ठुकी हुई

मनुष्य होने की अन्तिम परिभाषा

इन भाषाओं और परिभाषाओं को तोड़-फोड़कर

अपने सारे कपड़े-लत्ते छोड़कर

निष्कवच और निर्वस्त्र

मैं निकल जाना चाहता हूँ एक ऐसी अन्तहीन यात्रा पर

अपनी त्वचा तक उतार सकना शामिल हो जिसमें

फिर मैं देखता हूँ

वह कौन है जो आता है मेरे साथ

और कौन रक्त से छलछलाते मेरे शरीर पर फेंकता है पत्थर



O Chidiya | Aishwarya Tiwari
O Chidiya | Aishwarya Tiwari episode artwork
#1244
08/26/2026

ओ चिड़िया! ।  ऐश्वर्या तिवारी 


ओ चिड़िया

आ बैठ खिड़की पे

मैं मरीज़ इस दुनियादारी का

देखा नहीं है आसमान का रंग अरसे से

आ बैठ संग मेरे

बता मुझे क्या रंग बटा है ऊपर-ऊपर?

क्या इतनी ही उलझन है उधर?

मैं क़ैदी हूँ कितने बंधन का

क्या जानूँ जिसे छू लूँ

उलझ जाए वो भी दो-एक डोर में।

दिल का बीमार हूँ इतना कि

बाज़ार से ले आपा था पिंजरा,

वो कहते हैं

जिससे होता है प्रेम उसे रखते हैं संग हमेशा

रखा है अब भी वो किसी कोने में

जिसकी सलाखों पर लिखा है बाज़ारू भाषा में - प्रेम।

आ बैठ तू फिर भी

छोड़ तमाम दुनिया की भाषा-परिभाषा

छोड़ यह पिंजरा-विंजरा

मैं डाल दूंगा उसमें अपना जूता

तू बता-

कैसा है सब वहाँ

जहाँ कहीं से आई है तू?


आ मुझसे बतिया

इसी बहाने अरसों से पड़ी बंद खिड़की खुल जाएगी

फिर कौन है जो आकर यहाँ बैठेगी गाएगी

आ मुझे तनिक प्रेम करने दे

आ कि जीवन में जीवन रस भरने दे

मैं नहीं कहता तेरा यही ठिकाना है

आ कि तुझे एक दिन उड़ ही जाना है।



Seedhi Si Baat | Pablo Neruda | Translation - Manglesh Dabral
Seedhi Si Baat | Pablo Neruda | Translation - Manglesh Dabral episode artwork
#1243
08/25/2026

सीधी सी बात।  पाब्लो नेरुदा 

(अनुवाद: मंगलेश डबराल) 


शक्ति होती है मौन (पेड़ कहते हैं मुझसे)

और गहराई भी (कहती हैं जड़ें)

और पवित्रता भी (कहता है अन्न)

 

पेड़ ने कभी नहीं कहा:

‘मैं सबसे ऊंचा हूँ!’


जड़ ने कभी नहीं कहा:

‘मैं बेहद गहराई से आयी हूँ!’


और रोटी कभी नहीं बोली:

'दुनिया में क्या है मुझसे अच्छा'



Drishya Aur Bimb | Rajesh Joshi
Drishya Aur Bimb | Rajesh Joshi episode artwork
#1242
08/24/2026

दृश्य और बिम्ब। राजेश जोशी 


एक सिनेमा घर के सामने छूटी हुई जगह में

एक नए मॉडल की चमचमाती कार

एक विकलांग बच्चे को डरा रही है

कार धीरे धीरे आगे सरक रही है

और डरता, घबराता, गिरता पड़ता

उल्टे पाँव दौड़ने की कोशिश कर रहा है

बच्चा

ड्राइवर मुस्कुरा रहा है

और आसपास खड़े तमाशबीन अंदर ही अंदर डर रहे हैं

तरस खा रहे हैं

पर हँस रहे हैं।

यह एक दृश्य है

जो हमारे समय के बिम्ब में बदल रहा है ।



Gh Ra | Arun Kumar Singh
Gh Ra | Arun Kumar Singh episode artwork
#1241
08/23/2026

घ र । अरुण कुमार सिंह 


घर की याद में

घर का स्पर्श है

शब्दशः घ र

बुदबुदाते हुए

शरीर का स्पर्श करता हूँ

रेखाएं खोजती रहती हैं

रास्ता घर का

रेखाएं अंधी हैं

घर नहीं दिखता

आजकल बहुत चलता हूँ

खड़ा रहता हूँ

दूर तक देखता हूँ 


सबके सामने कपड़ों के भीतर

नहीं टटोल पाता

कायर शब्द गले में मिलता है

उबकी आते ही किराए के कमरे में भागता हूँ

चुपके से ढूंढता हूँ 

र 

के बीच का हिस्सा



Dastak | Gulzar
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#1240
08/22/2026

दस्तक । गुलज़ार


सुब्ह सुब्ह इक ख़्वाब की दस्तक पर दरवाज़ा खोला' 

देखा सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आए हैं


आँखों से मानूस थे सारे

चेहरे सारे सुने सुनाए


पाँव धोए, हाथ धुलाए

आँगन में आसन लगवाए


और तन्नूर पे मक्की के कुछ मोटे मोटे रोट पकाए

पोटली में मेहमान मिरे


पिछले सालों की फ़सलों का गुड़ लाए थे

आँख खुली तो देखा घर में कोई नहीं था


हाथ लगा कर देखा तो तन्नूर अभी तक बुझा नहीं था

और होंटों पर मीठे गुड़ का ज़ाइक़ा अब तक चिपक रहा था


ख़्वाब था शायद!

ख़्वाब ही होगा!!


सरहद पर कल रात, सुना है चली, थी गोली

सरहद पर कल रात, सुना है


कुछ ख़्वाबों का ख़ून हुआ था



Shraadh | Ashutosh Sharma
Shraadh | Ashutosh Sharma episode artwork
#1239
08/21/2026

श्राद्ध - आशुतोष शर्मा 


किसी चींटी को बचपन में कुचला था

केंचुए को बीच से काट दिया था मेरा जूता

छत से मारे थे चप्पल किसी भिखारी को

किसी को कुलटा तो किसी को कहा वेश्या

झूलों पे बन बैठा कभी तानाशाह

उपेक्षकों की सामूहिकता में रहा कभी शामिल

बहनों के बस्तों में भर दी छिपकलियां

मारे थे कंकड़ कभी मां के एड़ी पर

पत्थर से उजाड़ दिया किसी बुलबुल का आशियाना


अग्नि नहीं जला सकता मेरा अधर्म

गंगाजल को सोख जाएगा मेरा कोढ़

पीले पड़ जायेंगे मेरे मुख में वृन्दापर्ण

संस्कारच्युत शवों की भांति भटक रहा है मेरा पाप

मृत्यु पर सिरहाने मेरे

पंजे जूते चप्पल

ककड़ पत्थर और छिपकलियां थी

किन्तु मेरे श्राद्ध में नदारद थे

चींटी बुलबुल केंचुए 

भिखारी बस्ते उपेक्षित और झूले

कुलटाएं वेश्याएं बहनें व माताएं

किसी शास्त्रीय वर्जना के कारण

जीते जी नहीं आ सकते शमशान

उनके मृत्यु की प्रतीक्षा के एक और स्वार्थी पाप का बोझ

नहीं उठा सकती मेरी आत्मा।


Ek Khwaish | Amrita Sinha
Ek Khwaish | Amrita Sinha episode artwork
#1238
08/20/2026

एक ख्वाहिश । अमृता सिन्हा


कभी कभी कुछ दूरियाँ अच्छी होती हैं,


जैसे आँखों से काजल की दूरी

कढ़ाही से करछी की दूरी

लेखक की कलम से दूरी

रचनाकार की रचनात्मकता से दूरी

प्रेमी की प्रेम से दूरी


अंतर्मन की गहराई में उतरने की ख़ातिर

बाहरी दुनियाँ से दूरी, सोंशल मीडिया से अवकाश

बाहरी कोलाहल से अलग-थलग


बनायी जाये कुछ दिनों की दूरी

रहा जाए एकदम ख़ामोश

बनाया जाये चुप्पियों का पहाड़

बिताया जाये कुछ दिन, मन की

चंचल फुदकती

गिलहरियों के साथ।


सारी दुनियाँ की क़तर-व्योंत से दूर

सिर्फ और सिर्फ मैं रहूँ

और रहे

सिर्फ़ अपना ख़्वाब।


Vismay Tarbooz Ki Tarah | Alok Dhanwa
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#1237
08/19/2026

विस्मय तरबूज की तरह ।  आलोकधन्वा


तब वह ज़्यादा बड़ा दिखाई देने लगा

जब मैं उसके किनारों से वापस आया


वे स्त्रियाँ अब अधिक दिखाई देती हैं

जिन्होंने बचपन में मुझे चूमा


वे जानवर

जो सुदूर धूप में मेरे साथ खेलते थे


और उन्हें इंतज़ार करना नहीं आता था

और वे पहले छाते


बादल जिनसे बहुत क़रीब थे

समुद्र मुझे ले चला उस दुपहर में


जब पुकारना भी नहीं आता था

जब रोना ही पुकारना था


जहाँ विस्मय

तरबूज़ की तरह


जितना हरा उतना ही लाल।


Indhan | Gulzar
Indhan | Gulzar episode artwork
#1236
08/18/2026

ईंधन ।  गुलज़ार


छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी

हम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थे

आँख लगाकर - कान बनाकर

नाक सजाकर -

पगड़ी वाला, टोपी वाला

मेरा उपला -

तेरा उपला -

अपने-अपने जाने-पहचाने नामों से

उपले थापा करते थे


हँसता-खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकर

गोबर के उपलों पे खेला करता था

रात को आँगन में जब चूल्हा जलता था

हम सारे चूल्हा घेर के बैठे रहते थे

किस उपले की बारी आयी

किसका उपला राख हुआ

वो पंडित था -

इक मुन्ना था -

इक दशरथ था -

बरसों बाद - मैं

श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ

आज की रात इस वक्त के जलते चूल्हे में

इक दोस्त का उपला और गया !



Kitabein | Tanwir Sheikh Ilham
Kitabein | Tanwir Sheikh Ilham episode artwork
#1235
08/17/2026

 किताबें।  तनवीर शेख़ 'इल्हाम’ 


किताबें पढ़ा करों

ये तार्किक बनाती हैं तुम्हें

और बनाती हैं मार्मिक तुम्हारे विचारों को

ताकि तुम अपने अधिकार को

अपने कर्तव्य को समझ सको, परख सको

किताबें पढ़ा करों

क्योंकि ये तुम्हें साँचे में ढालकर

तुम्हारे व्यक्तित्व को और अद्वितीय बनाती है

ठीक उस कुम्हार की तरह जो

खुरदुरी मिट्टी को साँचकर

उसका मोल बढ़ाते हैं

तो तुम पढ़ो किताबें

जितनी हो सके पढ़ो 

ताकि तुम ख़ुद को जान सको

और जान सकों अपने हृदय की चाहत को

ताकि लड़कर जीत सकों उस समाज से

जिसने तुम्हें जकड़े रखा है


तो तुम पढ़ो...

और तब तक मत रुको

जब तक तुम उस आसमाँ को पा न लो

जो तुम्हारा ही है

और आत्मसात कर लो कि

ये किताबें क्रांति है

इसे पढ़ने वाला

इसे समझने वाला

और इसका प्रयोग करने वाला

हर एक मनुष्य क्रांतिकारी है!



Upeksha | Subhadra Kumari Chauhan
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#1234
08/16/2026

उपेक्षा ।  सुभद्राकुमारी चौहान


इस तरह उपेक्षा मेरी,

क्यों करते हो मतवाले!

आशा के कितने अंकुर,

मैंने हैं उर में पाले॥


विश्वास-वारि से उनको,

मैंने है सींच बढ़ाए।

निर्मल निकुंज में मन के,

रहती हूँ सदा छिपाए॥


मेरी साँसों की लू से

कुछ आँच न उनमें आए।

मेरे अंतर की ज्वाला

उनको न कभी झुलसाए॥


कितने प्रयत्न से उनको,

मैं हृदय-नीड़ में अपने

बढ़ते लख खुश होती थी,

देखा करती थी सपने॥


इस भांति उपेक्षा मेरी

करके मेरी अवहेला

तुमने आशा की कलियाँ

मसलीं खिलने की बेला॥



Mujhe Teen Do Shabd | Agyeya
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#1233
08/15/2026

मुझे तीन दो शब्द । अज्ञेय


मुझे तीन दो शब्द कि मैं कविता कह पाऊँ।


एक शब्द वह जो न कभी जिह्वा पर लाऊँ,

और दूसरा : जिसे कह सकूँ

किंतु दर्द मेरे से जो ओछा पड़ता हो।

और तीसरा : खरा धातु, पर जिसको पाकर पूछूँ—

क्या न बिना इसके भी काम चलेगा? और मौन रह जाऊँ।


मुझे तीन दो शब्द कि मैं कविता कह पाऊँ।



Gawahi | Adnan Kafeel Darwesh
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#1232
08/14/2026

गवाही।  अदनान कफ़ील दरवेश 


क़ब्र में

मेरी बगल में ही लिटाना

मेरी कविता को भी

जो मेरी दोस्त रही

मेरे उन यातना के क्षणों में भी

इस तरह हम एक साथ उठेंगे

महशर के रोज़

शुभ दिन बोलते हुए

एक दूसरे को

उसे लिटाना ज़रूर

क्योंकि उसे सबसे बड़ी अदालत में

उस दिन

मेरे ख़िलाफ़ गवाही देनी है।



Kashi Mere Kashi | Aishwarya Tiwari
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#1231
08/13/2026

काशी मेरे काशी । ऐश्वर्या तिवारी


मैं निरे शुन्य मैं बैठी 

वो जब आया था तो शुन्य हुए आया था

हर बार कहता था -

मैं कुछ नहीं, कोई नहीं मैं।

हम मिलते

बैठते कई घंटों

फिर चले जाते,

एक दिन मिलते हुए मैंने कहा - साड़ी

और देखा उसे होते हुए बुनकर

जोड़-तोड़ कर ताना-बाना

बुनने लगा है साड़ी

परखने आ गया है उसे

धागों की बुनावट का सलीका।

मैंने कहा सीपियों वाले झुमके

उसे देखा समन्दर किनारे

बढ़ गई है उसकी यात्रा

थोड़ा और सीखने लगा है वो तैराकी

अब नहीं कहता कि डरता है वो बहते पानी से।

मैंने जैसे ही कहा भूख

वो था कहीं किसी खेत की मेड़ पर

अपना खुरपी कुदाल लिए

हाँकते हुए बैलों को

करते हुए अगले फसल के बुआई की तैयारी।


फिर मैंने जब कहा छाँव

उसे पेड़ होते पाया;

खुशबू के सुनते ही

मुझे उसका गुलाब, मोगरा, शिउली होना याद है।

मैंने कहा स्पर्श

और मुझे याद है उसका बच्चा होना

 मेरे माथे को चूमना,

मैंने जब भी कहा दुःख

उसने गले लगाने में ज़रा देर नहीं की।

मैंने जैसे ही कहा इंतज़ार

उसे पहाड़ होना आ गया,

मेरे सफ़र कहते ही

बहने लगा वो नदी-सा कल-कल।

मैं जो-जो कहती गई

वो सो-सो होता गया

मैं जो बैठी थी शून्य में

वो जो कहता था - मैं कुछ नहीं, कोई नहीं हूँ 

इसी तरह एक दिन

मैं कहूँगी काशी...

मेरे काशी..

और देखूंगी

कैसे होता है वो

अपने आप से मुक्त

और सिमट कर आ जाता है मुझमें

जैसे दुनिया की नाभि से काटकर


अंतिम बार लाए जाते हैं लोग मणिकर्णिका के घाट पर।

मेरा कहना और उसका होते जाना

मेरी इच्छाए और उसकी फ़क़ीरी

गुँथ जाएगी इस तरह

कि एक दिन वो कहेगा कुछ

और मैं होती जाउंगी उसके कहे अनुसार

हम हमारे बन्धन भी हैं

और हम ही हैं हमारी मुक्ति भी।



Parakhna Mat | Bashir Badr
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#1230
08/12/2026

परखना मत । बशीर बद्र


परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता


किसी भी आइने में देर तक चेहरा नहीं रहता

बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना


जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता

हज़ारों शेर मेरे सो गए काग़ज़ की क़ब्रों में


अजब माँ हूँ कोई बच्चा मिरा ज़िंदा नहीं रहता

मोहब्बत एक ख़ुशबू है हमेशा साथ चलती है


कोई इंसान तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता


तुम्हारा शहर तो बिलकुल नए अंदाज़ वाला है

हमारे शहर में भी अब कोई हम सा नहीं रहता 



Kalam | Vishwanath Prasad Tiwari
Kalam | Vishwanath Prasad Tiwari episode artwork
#1229
08/11/2026

 कलम। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी 


कलम

उठाओ इसे

इसमें छिपा है

देवताओं-अप्सराओं का गान

अबोध शिशुओं की मुस्कान

यह भर सकती है फूलों में रंग

पानी में आग

और आग में थोड़ी-सी रोशनी

फेंको इसे तौलकर

शिलाखंड से फूट पड़ेंगे निर्झर 

बह जाएँगे ब्रह्मास्त्र

यह दे सकती है

अनाम को नाम

अरूप को रूप

सन्नाटे को शब्द

मिटा सकती है

जंगल और समुद्र की लिपि

बना सकती है

धरती का व्याकरण

अगर तुम्हारी गफलत से

यह पड़ी रह गई अँधेरे में

तो धरती पर छा जाएगा अंधकार

दहाड़ने लगेंगे हिंस्त्र पशु

उठाओ इसे

सिसक रही है यह अँधेरे में असहाय

इसे चाहिए एक हाथ

जिसने वेद लिखा

और लोहा गलाया

इसे चाहिए एक हाथ

जो कभी मत लिखे उपसंहार

उपसंहार के लिए छोड़ जाए

इसे।



Nayi Nayi Aankhein Hon To | Nida Fazli
Nayi Nayi Aankhein Hon To | Nida Fazli episode artwork
#1228
08/10/2026

नई नई आँखें हों तो ।  निदा फ़ाज़ली


नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है


कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन अब घर अच्छा लगता है

मिलने-जुलने वालों में तो सब ही अपने जैसे हैं


जिस से अब तक मिले नहीं वो अक्सर अच्छा लगता है

मेरे आँगन में आए या तेरे सर पर चोट लगे


सन्नाटों में बोलने वाला पत्थर अच्छा लगता है

चाहत हो या पूजा सब के अपने अपने साँचे हैं


जो मूरत में ढल जाए वो पैकर अच्छा लगता है

हम ने भी सो कर देखा है नए पुराने शहरों में


जैसा भी है अपने घर का बिस्तर अच्छा लगता है

नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है


Dushwari | Javed Akhtar
Dushwari | Javed Akhtar episode artwork
#1227
08/09/2026

दुश्वारी । जावेद अख़्तर


मैं भूल जाऊँ तुम्हें


अब यही मुनासिब है

मगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ


कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो

कोई ख़्वाब नहीं


यहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँ

कम-बख़्त


भुला न पाया वो सिलसिला

जो था ही नहीं


वो इक ख़याल

जो आवाज़ तक गया ही नहीं


वो एक बात

जो मैं कह नहीं सका तुम से


वो एक रब्त

जो हम में कभी रहा ही नहीं


मुझे है याद वो सब

जो कभी हुआ ही नहीं


Hai Daiyya | Nilesh Raghuvanshi
Hai Daiyya | Nilesh Raghuvanshi episode artwork
#1226
08/08/2026

हाय दैया । नीलेश रघुवंशी 


एक सुंदर ड्राइंगरूम के एक कोने में खड़ी है एक स्त्री मुस्कुराती-सी

कजरारी आँखों के संग भौंह को टेढ़ा किए

माथे पर लाल टीका उसके नीचे और ऊपर चार छोटी- छोटी बिंदी

ओंठों पर लाली ठोड़ी पर सात टिकुली

काली धोती के संग चटक हरे रंग का पोलका

हाथ में गिलट के कड़े और बाजुबंद

गले में हँसली बजट्टी माथे पर गिलट की बेड़ी लगाए

कमर में करधौनी और पाँव में आयलें संग में आँवड़ा कड़ा भी

स्त्री के सिर पर टोकरी

टोकरी में फल हैं चमकदार और रंगीन

सचमुच की फल बेचने वाली

अगर इसे देख ले तो हँसेगी कितना

हाय दैया हाय दैया करते हो जाएगी लोट-पोट

अगर फलों की टोकरी लिए खड़ी हो जाए कोने में

तो क्या लगेगी वह भी इतनी लुभावनी और इतनी ही सुंदर

धत्-

झटक देगी सर को और कहेगी इसको बनाने वाले की मति फिर गई है

चौराहे पर मुझ जैसी कई हर दिन सिर पर टोकरी लिए बेचती हैं फल

जो होते इतने गहने और सिंगार तो काहे को

भरी दुपहरी में हम अपना तन जलाते

आग लगे ससुरों की हँसी ठिठोली को

मूँछोंबारों की मूँछें बर जाएँ हमीं को सजा लिए अपने घर में

हाय दैया..



Prem Ka Sparsh | Rabindranath Tagore | Translation - Hazari Prasad Dwivedi
Prem Ka Sparsh | Rabindranath Tagore | Translation - Hazari Prasad Dwivedi episode artwork
#1225
08/07/2026

प्रेम का स्पर्श । रवींद्रनाथ टैगोर

अनुवाद : हजारीप्रसाद द्विवेदी


हे भुवन,


मैंने जब तक

तुम्हें प्यार नहीं किया था


तब तक तुम्हारा प्रकाश

खोज-खोजकर (भी) अपना सारा धन नहीं पा सका था!


उस समय तक

समूचा आकाश


हाथ में अपना दीप लिए हर सूनेपन में बाट जोह रहा था।

मेरा प्रेम गान गाता हुआ आया,


(फिर न जाने) क्या कानाफूसी हुई,

उसने डाल दी तुम्हारे गले में


अपने गले की माला!

मुग्ध नयनों से हँसकर


उसने तुम्हें

चुपचाप कुछ दे दिया,


(ऐसा-कुछ) जो तुम्हारे गोपन हृदय-पट पर

चिरकाल तक बना रहेगा, तारा-हार में पिरोया हुआ!



Ameeri Rekha | Kumar Ambuj
Ameeri Rekha | Kumar Ambuj episode artwork
#1224
08/06/2026

अमीरी रेखा -  कुमार अम्बुज


मनुष्य होने की परंपरा है कि वह किसी कंधे पर सिर रख देता है

और अपनी पीठ पर टिकने देता है कोई दूसरी पीठ


ऐसा होता आया है, बावजूद इसके

कि कई चीज़ें इस बात को हमेशा कठिन बनाती रही हैं


और कई बार आदमी होने की शुरुआत

एक आधी-अधूरी दीवार हो जाने से, पतंगा, ग्वारपाठा


या एक पोखर बन जाने से भी होती है

या जब सब रफ़्तार में हों तब पीछे छूट जाना भी एक शुरुआत है


बशर्ते मनुष्यता में तुम्हारा विश्वास बाक़ी रह गया हो

नमस्कार, हाथ मिलाना, मुस्कुराना, कहना कि मैं आपके


क्या काम आ सकता हूँ—

ये अभिनय की सहज भंगिमाएँ हैं और इनसे अब


किसी को कोई ख़ुशी नहीं मिलती

शब्दों के मानी इस तरह भी ख़त्म किए जाते हैं


तब अपने को और अपनी भाषा को बचाने के लिए

हो सकता है तुम्हें उस आदमी के पास जाना पड़े


जो इस वक़्त नमक भी नहीं ख़रीद पा रहा है

या घर की ही उस स्त्री के पास


जो दिन रात काम करती है

और जिसे आज भी मज़दूरी नहीं मिलती


बाज़ार में तो तुम्हारी छाया भी नज़र नहीं आ सकती

उसे दूसरी तरफ़ से आती रोशनी दबोच लेती है


वसंत में तुम्हारी पत्तियाँ नहीं झरतीं

एक दिन तुम्हारी मुश्किल यह हो सकती है


कि तुम नश्वर नहीं रहे

तुम्हें यह देखने के लिए जीवित रहना पड़ सकता है


कि सिर्फ़ अपनी जान बचाने की ख़ातिर

तुम कितनी तरह का जीवन जी सकते हो


जब लोगों को रोटी भी नसीब नहीं

और इसी वजह से साठ-सत्तर रुपए रोज़ पर तुम एक आदमी को


और सौ-डेढ़ सौ रुपए रोज़ पर एक पूरे परिवार को ग़ुलाम बनाते हो

और फिर रात की अगवानी में कुछ मदहोशी में सोचते हो


कभी-कभी घोषणा भी करते हो—

मैं अपनी मेहनत और क़ाबलियत से ही यहाँ तक पहुँचा हूँ।



Hum Panchhi Unmukt Gagan Ke | Shivmangal Singh Suman
Hum Panchhi Unmukt Gagan Ke | Shivmangal Singh Suman episode artwork
#1223
08/05/2026

हम पंछी उन्मुक्त गगन के ।  शिवमंगल सिंह ‘सुमन’


हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के

पिंजरबद्ध न गा पाएँगे,

कनक-तीलियों से टकराकर

पुलकित पंख टूट जाऍंगे।


हम बहता जल पीनेवाले

मर जाएँगे भूखे-प्‍यासे,

कहीं भली है कटुक निबोरी

कनक-कटोरी की मैदा से,


स्‍वर्ण-श्रृंखला के बंधन में

अपनी गति, उड़ान सब भूले,

बस सपनों में देख रहे हैं

तरू की फुनगी पर के झूले।


ऐसे थे अरमान कि उड़ते

नील गगन की सीमा पाने,

लाल किरण-सी चोंचखोल

चुगते तारक-अनार के दाने।


होती सीमाहीन क्षितिज से

इन पंखों की होड़ा-होड़ी,

या तो क्षितिज मिलन बन जाता

या तनती साँसों की डोरी।


नीड़ न दो, चाहे टहनी का

आश्रय छिन्‍न-भिन्‍न कर डालो,

लेकिन पंख दिए हैं, तो

आकुल उड़ान में विघ्‍न न डालो।



Ma | Padma Sachdeva
Ma | Padma Sachdeva episode artwork
#1222
08/04/2026

माँ । पद्मा सचदेव


बुलाने के लिए कई नाम हैं


जिसे पुकारो बोलता भी है

पर एक नाम ऐसा है जिसे पुकारो तो


सब चौकन्ने हो जाते हैं

सभी सोचते हैं ये नाम मेरे लिए तो नहीं


माँ... माँ... माँ...

ओ लड़के


ओ बेटा

वह मेरी बेटी


कहाँ मर गई हो

माँ माँ माँ कहता जब कोई बच्चा


गली में से निकलता है

सड़क पार करता है


या पहाड़ चढ़ता है

पहाड़ उतरकर आँगन में आ खड़ा होता है


तब माँ एकदम सुबह के गुलाब की तरह

खिल उठती है


दोनों दरवाज़े थाम कर देखती है

गलियों में जाते, गुल्ली-डंडा घुमाते, गिट्टे उछालते


माँ माँ कहकर लिपट जाते हैं

माँ को सब एक तरह से ही बुलाते हैं


मधुरता में नहला कर, चाव से भर कर

ज़रा-सा डर कर आतुरता से


माँ... माँ... माँ

बछड़ा रंभाता है बां बां बां


गाय कई बार रस्सी तोड़ने का यत्न करती है

मालिक का कोई डर नहीं रहता


कोई भी उलझन हो, कोई भी ख़ुशी हो, कोई भी उम्र हो

कहता है माँ, माँ कहाँ हो तुम माँ


हाय बाप कोई नहीं कहता


Dono Oar Prem Palta Hai | Maithilisharan Gupt
Dono Oar Prem Palta Hai | Maithilisharan Gupt episode artwork
#1221
08/03/2026

दोनों ओर प्रेम पलता है।  मैथिलीशरण गुप्त 


दोनों ओर प्रेम पलता है।

सखि, पतंग भी जलता है

हां! दीपक भी जलता है।


सीस हिलाकर दीपक कहता - 

’बन्धु वृथा ही तू क्यों दहता?’

पर पतंग पड़ कर ही रहता

कितनी विह्वलता है

दोनों ओर प्रेम पलता है।


बचकर हाय! पतंग मरे क्या?

प्रणय छोड़ कर प्राण धरे क्या?

जले नहीं तो मरा करे क्या?

क्या यह असफ़लता है? 

दोनों ओर प्रेम पलता है।


कहता है पतंग मन मारे- 

’तुम महान, मैं लघु, पर प्यारे,

क्या न मरण भी हाथ हमारे?

शरण किसे छलता है?’

दोनों ओर प्रेम पलता है।


दीपक के जलने में आली,

फिर भी है जीवन की लाली।

किन्तु पतंग-भाग्य-लिपि काली,

किसका वश चलता है?

दोनों ओर प्रेम पलता है।


जगती वणिग्वृत्ति है रखती,

उसे चाहती जिससे चखती;

काम नहीं, परिणाम निरखती।

मुझको ही खलता है।

दोनों ओर प्रेम पलता है।



Lipi | Hemant Deolekar
Lipi | Hemant Deolekar episode artwork
#1220
08/02/2026

लिपि । हेमंत देवलेकर 


उन्होंने कहा

-" लिखो"

मैं मोबाइल पर टाइप करने लगा

यह देख वे भड़क उठे

-"हमने कहा, लिखो"


मेरी याददाश्त पर गहरी चोट पड़ी

और मोबाइल हाथ से गिर गया

वे पूर्वज थे

खिन्न होकर लौट गए

मैने गिरे हए मोबाइल को देखा :

मेरे हाथ से समूची लिपि फिसल गई थी



Barsaat Mubarak Ho | Meena Kumari 'Naaz'
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#1219
08/01/2026

बरसात मुबारक हो। मीना कुमारी नाज़


बरसात मुबारक हो

ये साथ मुबारक हो


हर दिन रहे सलोना

हर रात मुबारक हो


सँवलाई हुई शामों को

हर सुब्ह मुबारक हो


हिचकी हो या सिसकी हो

हर नग़्मा मुबारक हो


बरसात मुबारक हो

बरसात मुबारक हो


Kuch Sacchaiyaan Kuch Jhooth | Wazda Khan
Kuch Sacchaiyaan Kuch Jhooth | Wazda Khan episode artwork
#1218
07/31/2026

कुछ सच्चाईयां, कुछ झूठ ।  वाज़दा खान 

 

केवल मिसाइलें ही गहरे

मारक असर नहीं करतीं

जीवन में और भी बहुत कुछ है 

गहरा और असरदार


कभी उतरो जो उन गहराइयों में

जहां बेहद अन्धेरा है

कहीं है चिड़िया की एक आवाज़

कहीं चट्टानों के बीच दबा कोई रंग

कहीं दरारों में बिंधा रुदन


निश्चित रूप से हर असर

गहरा अन्धेरा नहीं होता

मगर जो गहरा और असरदार है उनमें से

कुछ सितारों के साथ, तो कुछ

दूसरे ग्रह के सूर्य के साथ

छप जाते हैं पानी से लेकर

उन हवाओं तक


जो पिछली सदी और उससे भी

पिछली सदी में और आज तक एक

जैसी है, पानी भी एक जैसा है

मगर कुछ है जो बदलता जा रहा है

तेज़ी से वक्त के साथ 


देख पाती हूं आंखों के भीतर

चमकती धूप में पाती हूं तब

कुछ सच्चाइयां, कुछ झूठ, कुछ गणनायें

कुछ तथ्य, बहुत सारी चुप्पियां

और तबाह कर देने वाला

इक स्याह जुनून।


Mustanda Aur Bachcha | Shubha
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#1217
07/30/2026

मुस्टंडा और बच्चा।  शुभा


भाषा के अंदर बहुत सी बातें

सबने मिलकर बनाई होती हैं


इसलिए भाषा बहुत समय

एक विश्वास की तरह चलती है


जैसे हम अगर कहें बच्चा

तो सभी समझते हैं, हाँ बच्चा


लेकिन बच्चे की जगह बैठा होता है

एक परजीवी


एक तानाशाह

फिर भी हम कहते रहते हैं—


बच्चा! ओहो बच्चा!

और पूरा देश मुस्टंडों से भर जाता है


किसी उजड़े हुए बूढ़े में

किसी ठगी गई औरत में


किसी गूँगे में जैसे किसी स्मृति में

छिपकर जान बचाता है बच्चा


अब मुस्टंडा भी है और बच्चा भी है

इन्हें अलग-अलग पहचानने वाला भी है


भाषा अब भी है विश्वास की तरह अकारथ