Pratidin Ek Kavita

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By: Nayi Dhara Radio

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

Benaras | Kedarnath Singh
#1084
Today at 12:30 AM

बनारस | केदारनाथ सिंह


इस शहर मे वसंत

अचानक आता है


और जब आता है तो मैंने देखा है

लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से


उठता है धूल का एक बवंडर

और इस महान पुराने शहर की जीभ


किरकिराने लगती है

जो है वह सुगबुगाता है


जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ

आदमी दशाश्वमेध पर जाता है


और पाता है घाट का आख़िरी पत्थर

कुछ और मुलायम हो गया है


सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों में

एक अजीब-सी नमी है


और एक अजीब-सी चमक से भर उठा है

भिखारियों के कटोरों का निचाट ख़ालीपन


तुमने कभी देखा है

ख़ाली कटोरों में वसंत का उतरना!


यह शहर इसी तरह खुलता है

इसी तरह भरता


और ख़ाली होता है यह शहर

इसी तरह रोज़-रोज़ एक अनंत शव


ले जाते हैं कंधे

अँधेरी गली से


चमकती हुई गंगा की तरफ़

इस शहर में धूल


धीरे-धीरे उड़ती है

धीरे-धीरे चलते हैं लोग


धीरे-धीरे बजाते हैं घंटे

शाम धीरे-धीरे होती है


यह धीरे-धीरे होना

धीरे-धीरे होने की एक सामूहिक लय


दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को

इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है


कि हिलता नहीं है कुछ भी

कि जो चीज़ जहाँ थी


वहीं पर रखी है

कि गंगा वहीं है


कि वहीं पर बँधी है नाव

कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ


सैकड़ों बरस से

कभी सई-साँझ


बिना किसी सूचना के

घुस जाओ इस शहर में


कभी आरती के आलोक में

इसे अचानक देखो


अद्भुत है इसकी बनावट

यह आधा जल में है


आधा मंत्र में

आधा फूल में है


आधा शव में

आधा नींद में है


आधा शंख में

अगर ध्यान से देखो


तो यह आधा है

और आधा नहीं है


जो है वह खड़ा है

बिना किसी स्तंभ के


जो नहीं है उसे थामे हैं


Nav Varsh | Harivansh Rai Bachchan
#1083
Yesterday at 12:30 AM

नव वर्ष | हरिवंशराय बच्चन


वर्ष नव 

हर्ष नव

जीवन उत्कर्ष नव।


नव उमंग,

नव तरंग,

जीवन का नव प्रसंग।


नवल चाह,

नवल राह,

जीवन का नव प्रवाह।


गीत नवल,

प्रीति नवल,

जीवन की रीति नवल,

जीवन की नीति नवल,

जीवन की जीत नवल!



Akhbaar | Balswaroop Rahi
#1082
Last Tuesday at 12:30 AM

अखबार | बालस्वरूप राही


जिस दिन होता है इतवार, 

घर में आते ही अखबार, 

ऐसी छीन-झपट मचती

हो जाते हैं हिस्से चार!

पापा को खबरों का चाव, 

माँ पढ़ती दालों के भाव,

भैया खेलों में रमते, 

भाता मुझे बनाना नाव



Ghar | Mohan Rana
#1081
Last Monday at 12:30 AM

घर | मोहन राणा


धन्य धरती है जिसकी करुणा अक्षत


धन्य समुंदर जिसका नमक फीका नहीं होता

धन्य आकाश जो रहता हमेशा मेरे साथ हर जगह दिन रात


धन्य वे बीज जो पतझर को नहीं भूलते

धन्य वे शब्द भूलते नहीं जो चौखट पर कभी बाट लगाते दुख


उसकी स्मृति को

धन्य उस विचार पहिए पर टँकी छवियाँ


जो बन जाती टॉकीज़,

आकाशगंगा के छोर चुपचाप परिक्रमा में


धन्य यह साँस,

मैं कैसे भूल सकता हूँ घर


और कोने पर धारे का पानी



Hum Kya Jaane Qissa Kya Hai | Rahi Masoom Raza
#1080
Last Sunday at 12:30 AM

हम क्या जानें क़िस्सा क्या है  | राही मासूम रज़ा


हम क्या जानें क़िस्सा क्या है हम ठहरे दीवाने लोग

उस बस्ती के बाज़ारों में रोज़ कहें अफ़्साने लोग


यादों से बचना मुश्किल है उन को कैसे समझाएँ

हिज्र के इस सहरा तक हम को आते हैं समझाने लोग


कौन ये जाने दीवाने पर कैसी सख़्त गुज़रती है

आपस में कुछ कह कर हँसते हैं जाने पहचाने लोग


फिर सहरा से डर लगता है फिर शहरों की याद आई

फिर शायद आने वाले हैं ज़ंजीरें पहनाने लोग


हम तो दिल की वीरानी भी दिखलाते शरमाते हैं

हम को दिखलाने आते हैं ज़ेहनों के वीराने लोग


उस महफ़िल में प्यास की इज़्ज़त करने वाला होगा कौन

जिस महफ़िल में तोड़ रहे हों आँखों से पैमाने लोग



Dekho Ahista Chalo | Gulzar
#1079
Last Saturday at 12:30 AM

देखो आहिस्ता चलो | गुलज़ार


देखो आहिस्ता चलो और भी आहिस्ता ज़रा

देखना सोच सँभल कर ज़रा पाँव रखना


ज़ोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं

काँच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में


ख़्वाब टूटे न कोई जाग न जाए देखो

जाग जाएगा कोई ख़्वाब तो मर जाएगा



Yaad Rakhna | Shailja Pathak
#1078
Last Friday at 12:30 AM

याद रखना | शैलजा पाठक 


याद रखना

वह कहेंगे :


कम बोलो

कम खाओ


कम सजो

कम घूमो


कम हँसो

कम खिलखिलाओ


कम बनाओ दोस्त

कम करो सपने


कम हो

रहो कम


मेरी दोस्त!

तुम कम सुनना...


Tere Sapne Mein Thode Hun | Teji Grover
#1077
03/12/2026

तेरे सपने में थोड़े हूँ | तेजी ग्रोवर


तेरे सपने में थोड़े हूँ पगली

मैं तो बैठा हूँ


टाट पर

सजूगर


अचार भरी उँगलियाँ चाटता हुआ

मैं टाट पर थोड़े हूँ पगली


झूलती खाट में

सो रहा हूँ तेरे पास


इतना पास

कि तेरा पेट गुड़गुड़ाया


तो मैंने सोचा मेरा है

भोर तक यहीं हूँ पगली


तू साँस छोड़ेगी

तो भींज उठेंगी मेरी कोंपलें


मेरी खुरदरी उँगलियाँ

नींद की रोई तेरी आँखों पर


काँप-काँप जाएँगी

और तू


झपकी भर नहीं जगेगी रात में

मैं जा रहा हूँ पगली


तेरे खुलने से पहले

उजास में घुल रही है मेरी आँख


छूना मटका तो मान लेना

मैं आया था


घोर अँधेरे तपते तीर की तरह आया था

रात भर प्यासा रहा।



Main Badha Hi Ja Raha Hun | Shivmangal Singh Suman
#1076
03/11/2026

मैं बढ़ा ही जा रहा हूँ - शिवमंगल सिंह सुमन 


आज जो मैं इस तरह आवेश में हूँ, अनमना हूँ

यह न समझो मैं किसी के रक्त का प्यासा बना हूँ

सत्य कहता हूँ पराये पैर का काँटा कसकता

भूल से चींटी कहीं दब जाए भी तो 'हाय!' करता

पर जिन्होंने स्वार्थवश जीवन विषाक्त बना दिया है

कोटि-कोटि बुभुक्षितों का कौर तक, छिना लिया है

लाभ-शुभ लिखकर ज़माने का ह्रदय चूसा जिन्होंने 

और कल ही, बगल वाली लाश पर थूका जिन्होंने

बिलखते शिशु की व्यथा पर दृष्टि तक जिनने न फेरी

यदि क्षमा कर दूँ उन्हें, धिक्कार माँ की कोख मेरी

चाहता हूँ ध्वंस कर देना विषमता की कहानी

हो सुलभ सबको जगत में वस्त्र, भोजन, अन्न, पानी।


Main Neer Bhari | Mahadevi Verma
#1075
03/10/2026

मैं नीर भरी | महादेवी वर्मा


मैं नीर भरी दु:ख की बदली!

स्पंदन में चिर निस्पंद बसा;


क्रंदन में आहत विश्व हँसा,

नयनों में दीपक-से जलते


पलकों में निर्झरिणी मचली!

मेरा पग-पग संगीत-भरा,


श्वासों से स्वप्न-पराग झरा,

नभ के नव रँग बुनते दुकूल,


छाया में मलय-बयार पली!

मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल,


चिंता का भार, बनी अविरल,

रज-कण पर जल-कण हो बरसी


नवजीवन-अंकुर बन निकली!

पथ को न मलिन करता आना,


पद-चिह्न न दे जाता जाना,

सुधि मेरे आगम की जग में


सुख की सिहरन हो अंत खिली!

विस्तृत नभ का कोई कोना;


मेरा न कभी अपना होना,

परिचय इतना इतिहास यही


उमड़ी कल थी मिट आज चली!

मैं नीर भरी दु:ख की बदली!



Adrak | Ekta Verma
#1074
03/09/2026

 अदरक।  एकता वर्मा 


इनकी देह दुखों की अंतर्मुखी गाँठों से बनी थी 

जिन्होंने अपनी कब्रों की मिट्टी ठेलकर अपनी देह के लिए जगह बनाई थी।


ये आतताइयों का चरित्र पहचानते थे 

और उनके द्वारा कच्चा चबाए जाने के खिलाफ 

सुख की जिह्वा पर कसैलेपन की तरह उतरते थे। 


वे आघातों को अपनी छाती पर सहते थे 

इनका आखिरी कतरा  

प्रतिबद्धताओं की तीखी गंध से महकता था। 


वे रक्तबीज जैसे थे, उनके टुकड़े जहाँ गिरते 

हुजूम की शक्ल में वहीं से उग आते। 

उनका शरीर लोहे के तंतुओं से बँधा था 

उनको तोड़कर बंदरबाँट करना आसान नहीं था। 


एक दिन, इनमें से किसी ने

जिसके पिता का नाम शंबूक था,

ने किताब का आखिरी पृष्ठ पलटकर कहा- यह हमारी कहानी नहीं है।

इस इतिहास को जला देना चाहिए !


 द्रोणाचार्य की संतानों वाली सभा चीख उठी-  

खीं-खीं, खीं-खीं !!! 


एक औरत ने जो अहिल्या की परपौत्री थी, और मेड्यूसा की नातिन, ने कहा-

मेरी योनि 

एक मज़दूर की तरह खटते हुए 

असंतोष का नारा उछालना चाहती है,

बलत्कृत कामनाओं के नीचे दबा सुख का स्पन्दन खोज लाना चाहती है।


देवराजों की सभा चिल्लाने लगी, नुकेले दांतों से नोचने-फाड़ने लगी 

छी: छी: दुर्दांत! पतिता! 

जंगल से खदेड़ी गई जातियों का एक वारिस

राजधानी के शिक्षण संस्थान में,

शोध-प्रबंध में उद्धृत करने लगा 

अपने पुरखों के हत्यारों की सूची  


साक्षात्कार समिति चीखी- खीं-खीं, खीं-खीं 

खारिज करो, फेंको, बाहर करो!


ये तिरस्कृत, बहिष्कृत, अपमानित होती जातियाँ 

चाहतीं तो एक तटस्थ, समझौतावादी जीवन चुन सकती थीं।

लेकिन सहमति में झुके सारों के बीच 

जहाँ असहमति की उंगली उठाना अपराध हो, 

वे ओखली में सिर डालकर 

मूसलों को चुनौती देना धर्म की तरह चुनते हैं। 


वे अदरक की तरह जीते थे।

इनके होने भर से आतताइयों की नंगई ऐसे उघड़ती थी 

कि वे चीखते-उछलते दाँत -नाखून दिखाते, 

बंदरों के हुजूम सा दिखते। 


वही बंदर जो अदरक का स्वाद नहीं जानते।


दरअसल सभ्यता के विकास-क्रम में पिछड़े इन अमानुषों के लिए स्वाद भोग का विषय है 

जबकि मेहनतकशों के लिए वह संघर्ष का पर्याय था

जिन्होंने अपनी जिह्वा पर रोटी से कहीं ज़्यादा, 

आंसुओं के स्वाद को चखा था,

पसीने और पेशाब को चखा था।



Prathna Bani Rahi | Gopal Singh Nepali
#1072
03/08/2026

प्रार्थना बनी रही | गोपाल सिंह नेपाली


रोटियाँ ग़रीब की प्रार्थना बनी रही

एक ही तो प्रश्न है रोटियों की पीर का

पर उसे भी आसरा आँसुओं के नीर का

राज है ग़रीब का ताज दानवीर का

तख़्त भी पलट गया कामना गई नहीं

रोटियाँ ग़रीब की प्रार्थना बनी रही


चूम कर जिन्हें सदा क्राँतियाँ गुज़र गईं

गोद में लिये जिन्हें आँधियाँ बिखर गईं

पूछता ग़रीब वह रोटियाँ किधर गई

देश भी तो बँट गया वेदना बँटी नहीं

रोटियाँ ग़रीब की प्रार्थना बनी रही



Khana Hai | Priyankshi Mohan
#1071
03/07/2026

खाना है । प्रियाँक्षी मोहन 


खाना है

"वो" खाना है

क्या खाना है?

घर भर पूछे

बिटिया से

बिटिया को बस

रट लगी


कि "वो" खाना है

कल से

वो क्या होता

ज़रा बताओ?

सब पूछे बिटिया से

बिटिया को तो

नाम न सूझे 

कुछ मीठा

मीठा सूझे

टॉफी चॉकलेट

मिश्री, कुल्फी

क्या है वो

इन सब में?

बिटिया मुह फुलाए

दौड़े

इस कोने उस कोने


पापा मम्मी

दादा दादी

सब सो गए

जब थक के


बिटिया कुतरे

चीनी चाटे

नन्ही चीटी के संग में



Basant | Kedarnath Singh
#1070
03/06/2026

बसन्त | केदारनाथ सिंह


और बसन्त फिर आ रहा है

शाकुन्तल का एक पन्ना

मेरी अलमारी से निकलकर

हवा में फरफरा रहा है

फरफरा रहा है कि मैं उठूँ

और आस-पास फैली हुई चीज़ों के कानों में

कह दूँ 'ना'

एक दृढ़

और छोटी-सी 'ना'

जो सारी आवाज़ों के विरुद्ध

मेरी छाती में सुरक्षित है


मैं उठता हूँ

दरवाज़े तक जाता हूँ

शहर को देखता हूँ

हिलाता हूँ हाथ

और ज़ोर से चिल्लाता हूँ –

ना...ना...ना

मैं हैरान हूँ

मैंने कितने बरस गँवा दिये

पटरी से चलते हुए

और दुनिया से कहते हुए

हाँ हाँ हाँ...



Jab Jab Tum Chahoge Mujhse | Adiba Khanum
#1069
03/05/2026

जब जब तुम चाहोगे मुझसे । अदीबा ख़ानम


जब जब तुम चाहोगे मुझसे एक प्रेम पगी कविता

मेरी जान मैं तम्हें टूट कर प्रेम दूँगी

मेरे पसंदीदा मौसमों का आगाज़ हो तुम

जानते हो मैं तुम्हें शिउली की तरह मिलूँगी

हमेशा हर बरस बिखरती रहूँगी

तुम्हारे ज़हन के कच्चे रास्तों पर उजली - उजली

सुबह के शफ़्फ़ाफ़ उजालों सी

कुछ क्षणों का ये मिलन

यूँही न भूल पाओगे तुम,

साल दर साल

मेरी गन्ध से तुम्हारी स्मृतियाँ

झंकृत हो उठेगी किसी नाद की तरह

मैं वो हूँ जिसकी आँखें

अपने पसंदीदा फूलों के वियोग में

खुद फूल हो झरती रहीं हैं।

मैं दुआओं में अपनी

माँग लूँगी तुम्हारे लिए

हर मौसम में तुम्हारे पसंद के फूल

कि तुम कभी उन खुशबुओं से महरूम न रहो

जिनसे तुम्हें प्रेम है


क्या तुमने देखी है मुझ जैसी कोई बावरी

जिसने हमेशा ही चाहा खुशबू हो जाना,

कोई ऐसी गन्ध

जो तुम्हारी श्वास की आवाजाही में बसे

इस दुनिया में कुछ लोग ही यूँ जीते हैं कि

समझ पाएँ प्रेम के जादू को

और उनसे भी कम होते हैं वो लोग जिन्हें

प्रेम समझने की धुन

जीने नहीं देती,

और देखा जाए

तो मरने भी नहीं देती

दर असल कविता मेरे हदय से उठी

एक तीखी हूँक है

और मैंने कहा भी कि

जब जब तुम चाहोगे मुझसे एक प्रेम पगी कविता

मेरी जान मैं तम्हें दूट कर प्रेम दूँगी।



Mujhe Tum Mile | Phanishwar Nath Renu
#1068
03/04/2026

मुझे तुम मिले! | फणीश्वरनाथ रेणु


मुझे तुम मिले!


मृतक-प्राण में शक्ति-संचार कर;

निरंतर रहे पूज्य, चैतन्य भर!


पराधीनता-पाप-पंकिल धुले!

मुझे तुम मिले!


रहा सूर्य स्वातंत्र्य का हो उदय!

हुआ कर्मपथ पूर्ण आलोकमय!


युगों के घुले आज बंधन खुले!

मुझे तुम मिले!



Daudte Daudte Pyar | Nilesh Raghuvanshi
#1067
03/03/2026

दौड़ते-दौड़ते प्यार।  नीलेश रघुवंशी 


वह दौड़ रहा है

दिन ब दिन उसकी भागमभाग बढ़ती ही जा रही है

वह जितना दौड़ता जाता है सड़कें उतनी लंबी होती जाती हैं

दिन ब दिन पसरती सड़कें खत्म होने का नाम ही नहीं लेतीं

मैं उसे प्यार करती हूँ और उसकी दौड़ से भयभीत होती हूँ

भय खाती हूँ उसकी दिनचर्या से जिसमें कुछ पल भी नहीं उसके पास

कोसती हूँ बिना पेड़ और बिना छाँव वाले चौराहों और

सड़कों के किनारों को

उकसाते हैं जो उसे और-और दौड़ने के लिए

थकान से उसकी थक जाते हैं कपड़े

पसर जाती है थकान उससे पहले बिस्तर में

नींद में उसकी गोल घुमावदार सड़कें रास्ते जिनमें गुम होते हुए

कसमसाती हैं हमारी दोपहरें उसकी थकी आँखों में

मैं उससे प्यार करती हूँ और प्यार करते-करते शामिल हो गई दौड में

अब हम दोनों दौड रहे हैं

हम बैठे भी नहीं हैं और किसी के साथ खड़े भी नहीं हैं

हम तो बस दौडते जा रहे हैं

दौडते-दौडते हमने हमारी ही इच्छाओं को मार डाला

हाय री दौड़ तूने दौड़ते-दौड़ते भी हमें प्यार न करने दिया

मैं दौड़ से चिढ़ती हूँ लेकिन उससे प्यार करती हूँ

थका हारा सांसारिक प्यार हमारा



Rahe Na Koi Bhookha-Nanga | Koduram Dalit
#1066
03/02/2026

रहे न कोई भूखा–नंगा | कोदूराम दलित


पराधीन रहकर सरकस का शेर नित्य खाता है कोड़े,

पराधीन रहकर बेचारे बोझा ढोते हाथी-घोड़े ।


माता–पिता छुड़ा, पिंजरे में रखा गया नन्हा–सा तोता,

वह स्वतंत्र उड़ते तोतों को देख सदा मन ही मन रोता ।


चाहे पशु हो, चाहे पंछी परवशता कब, किसको भायी,

कहने का मतलब यह कि ‘परवशता’ होती दुखदायी।


ऐसी दुखदायी परवशता मानव को कैसे भायेगी?

औरों की दासता किसी को राहत कैसे पहुँचायेगी?


जो गुलाम हैं, उन लोगों से उनके दुख: की बातें पूछो,

औ’ हैं जो आज़ाद मुल्क़ के उनके सुख की बातें पूछो।


कहा सयानों ने सच ही है आज़ादी से जीना अच्छा,

किंतु ग़ुलामी में जिंदा रहने से मर जाना है अच्छा।


रह करके गोरों की परवशता में हम क्या-क्या न खो चुके,

पर पंद्रह अगस्त सन सैंतालीस को हम आज़ाद हो चुके।


यह सब अपने अमर शहीदों के भारी जप-तप का फल है,

मिलकर रहें, देश पनपावें तब तो फिर भविष्य उज्जवल है ।


आज़ादी पर आँच न आवे लहर-लहर लहराए तिरंगा,

हम संकल्प आज लेवें कि रहे न कोई भूखा–नंगा।


Hanso | Shraddha Upadhyay
#1065
03/01/2026

 हँसो।  श्रद्धा उपाध्याय 


कोई गिरे तो तुम उसे उठाते हुए गिरो फिर हँसो

 तुम्हारी खिलखिलाहट से किसी खंडहर में उड़ जाएंगे चमगादड़ 

इतिहास में कई अवकाश हैं जिनमें सज जाएगी तुम्हारी हँसी 

जिस सत्ता ने तुम्हें रोने नहीं दिया

उनको जीभ चढ़ा कर हँसो 

दो जहाँ दस दिशाओं में हँसो

 हँसो इतना कि बैठकों में रखे बुद्ध की तोंद पिरा जाए

 उस चुप्पी के सामने हँसो जिसके द्वार तोरण पर लिखा था कि हँसी कड़ जाली

 हँसो हे री जल्दी जल्दी बहुत सारा



Mil Hi Jayega Kabhi | Ahmed Mushtaq
#1064
02/28/2026

मिल ही जाएगा कभी | अहमद मुश्ताक़


मिल ही जाएगा कभी दिल को यक़ीं रहता है

वो इसी शहर की गलियों में कहीं रहता है


जिस की साँसों से महकते थे दर-ओ-बाम तिरे        

ऐ मकाँ बोल कहाँ अब वो मकीं रहता है        


इक ज़माना था कि सब एक जगह रहते थे

और अब कोई कहीं कोई कहीं रहता है


रोज़ मिलने पे भी लगता था कि जुग बीत गए

इश्क़ में वक़्त का एहसास नहीं रहता है


दिल फ़सुर्दा तो हुआ देख के उस को लेकिन 

उम्र भर कौन जवाँ कौन हसीं रहता है

 फ़सुर्दा: मुरझाया हुआ

 दर-ओ-बाम: (लाक्षणिक) मकान

  मकीं: मकान में रहने वाला 


Awara Din | Poornima Varman
#1063
02/27/2026

आवारा दिन। पूर्णिमा वर्मन


दिन कितने आवारा थे

गली गली और

बस्ती बस्ती

अपने मन

इकतारा थे

माटी की

खुशबू में पलते

एक खुशी से

हर दुख छलते

बाड़ी, चौक, गली अमराई

हर पत्थर गुरुद्वारा थे

हम सूरज

भिनसारा थे

किसने बड़े

ख़्वाब देखे थे

किसने ताज

महल रेखे थे

माँ की गोद, पिता का साया

घर घाटी चौबारा थे

हम घर का

उजियारा थे


Ek Khwaish | Sewak Nayyar
#1062
02/26/2026

एक ख़्वाहिश । सेवक नैयर


और मैं सोचता हूँ


यूँही

उम्र भर


एक कमरे में

शतरंज की मेज़ पर


तुम मुसलसल मुझे

मात देती रहो


मैं मुसलसल यूँही

मात खाता रहूँ


अपनी

तक़दीर पर


मुस्कुराता रहूँ



Iska Kya Matlab Hai | Krishna Mohan Jha
#1061
02/25/2026

इसका क्या मतलब है।  कृष्णमोहन झा


ड्योढ़ी के टाट पर


खीरे के पात की हरी छाँह के नीचे

मेरी बाट जोह रही होगी मेरी लालसा...


रात की शाखों से उतरकर रोज़

गिलहरी की तरह फुदकती हुई


मुझे खोज रही होगी मेरी नींद…

मेरे स्वप्न


मेरी अनुपस्थिति पर सिर टिकाकर सो रहे होंगे

और मेरे हिस्से का आसमान


बिना छुए ही धूसर हो रहा होगा…

इसका क्या मतलब है


कि जहाँ लौट पाना अब लगभग असंभव है

वहीं सबसे सुरक्षित है मेरा वजूद?


Kalam Tere Haath Mei Hai | Bhawani Prasad Mishra
#1060
02/24/2026

क़लम तेरे हाथ में है । भवानीप्रसाद मिश्र


क़लम तेरे हाथ में है, जो चाहे सो लिख

कुछ न सूझे तो अपना नाम लिख

क्या ज़रूरी है कि जो कुछ लिखा, वह छपे भी

न छपे सही अँगीठी के काम आएगा कभी


दम होगा तो धधक जाएगा

बोदा होगा तो बुझ जाएगा


लिखने की बेला बड़ी पावन होती है

सूखे मन के लिए सावन होती है

रोशनाई और क़लम का संयोग होता है

मन को सँजोने का प्राणान्तक योग होता है

क़लम तेरे हाथ में है, ललकार कर लिख

काग़ज़ हज़ार काले हों, मग़र कालिख़ न लिख।



Neend Uchat Jati Hai | Narendra Sharma
#1059
02/23/2026

नींद उचट जाती है । नरेंद्र शर्मा


जब-तब नींद उचट जाती है


पर क्या नींद उचट जाने से

रात किसी की कट जाती है?


देख-देख दु:स्वप्न भयंकर,

चौंक-चौंक उठता हूँ डरकर;


पर भीतर के दु:स्वप्नों से

अधिक भयावह है तम बाहर!


आती नहीं उषा, बस केवल

आने की आहट आती है!


देख अँधेरा नयन दूखते,

दुश्चिंता में प्राण सूखते!


सन्नाटा गहरा हो जाता,

जब-जब श्वान श्रृगाल भूँकते!


भीत भावना,भोर सुनहली

नयनों के न लाती है!


मन होता है फिर सो जाऊँ,

गहरी निद्रा में खो जाऊँ;


जब तक रात रहे धरती पर,

चेतन से फिर जड़ हो जाऊँ


उस करवट अकुलाहट थी, पर

नींद न इस करवट आती है!


करवट नहीं बदलता है तम,

मन उतावलेपन में अक्षम!


जगते अपलक नयन बावले,

थिर न पुतलियाँ, निमिष गए थम!


साँस आस में अटकी, मन को

आस रात भर भटकाती है!


जागृति नहीं अनिद्रा मेरी,

नहीं गई भव-निशा अँधेरी!


अंधकार केंद्रित धरती पर,

देती रही ज्योति चकफेरी!


अंतर्नयनों के आगे से

शिला न तम की हट पाती है!



Mujhe Tez Dhar Wali Kavitayein Chahiye | Pratibha Katiyar
#1058
02/22/2026

मुझे तेज़ धार वाली कविताएँ चाहिए । प्रतिभा कटियार


मुझे तेज़ धार वाली कविताएँ चाहिए


जिनके किनारे से गुज़रते हुए लहूलुहान हो जाए जिस्म

जिन्हें हाथ लगाते ही रिसकर बहने लगे


सब कुछ सह लेने वाला सब्र

मुझे ढर्रे पर चलती ज़िंदगी के गाल पर


थप्पड़ की तरह लगने वाली कविताएँ चाहिए

कि देर तक सनसनाता रहे ढर्रे पर चलने वाला जीवन


और आख़िर बदलनी ही पड़े उसे अपनी चाल

मुझे बारूद सरीखी कविताएँ चाहिए


जो संसद में किसी बम की तरह फूटें

और चीरकर रख दें बहरी सरकारों के


कानों के परदे

मुझे बहुत तेज़ कविताएँ चाहिए


साँसों की रफ़्तार से भी तेज़

समय की गति से आगे की कविताएँ


जो हत्यारों के मंसूबों को बेधती कविताएँ

और हो चुकी हत्याओं के ख़िलाफ़


गवाह बनती कविताएँ

मुझे चाहिए कविताएँ जिनसे


ऑक्सीजन का काम लिया जा सके

जिन्हें घर से निकलते वक़्त


किसी सुरक्षा कवच की तरह पहना जा सके

जिनसे लोकतंत्र को


भीड़तंत्र होने से बचाया जा सके

मुझे चाहिए इतनी पवित्र कविताएँ 


कि उनके आगे सजदा किया जा सके

रोया जा सके जी भर के


और सजदे से उठते हुए हल्का महसूस किया जा सके

मुझे चूल्हे की आग सी धधकती कविताएँ चाहिए


खेतों में बालियों सी लहलहाती कविताएँ चाहिए

मुझे मोहब्बत के नशे में डूबी कविताएँ चाहिए


और भोली गिलहरी सी फुदकती कविताएँ चाहिए

मुझे इस धरती पर


मनुष्यता की फ़सल उगाने वाली कविताएँ चाहिए।



Maun | Suryakant Tripathi 'Nirala'
#1057
02/21/2026

मौन । सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'


बैठ लें कुछ देर,

आओ, एक पथ के पथिक-से


प्रिय, अंत और अनंत के,

तम-गहन-जीवन घेर।


मौन मधु हो जाए

भाषा मूकता की आड़ में,


मन सरलता की बाढ़ में,

जल-बिंदु-सा बह जाए।


सरल अति स्वच्छंद

जीवन, प्रात के लघुपात से,


उत्थान-पतनाघात से

रह जाए चुप, निर्द्वंद।



Bas Ek Vachan | Mridula Shukla
#1056
02/20/2026

बस एक वचन।  मृदुला शुक्ला


जब तुम मुझसे कर रहे थे प्रणय निवेदन

तुम्हारी गर्म हथेलियों के बीच

कंपकंपा रहा था मेरा दायाँ हाथ

उसी वक़्त, तुम्हारे कमरे की दीवार पर

मेरे सामने टंगी थी एक तस्वीर

जिसमे एक जवान औरत पीस रही थी चक्की

और बूढ़ी औरत दे रही थी चक्की के बीच दाने

पास ही आधा पड़ा खाली मटका

उन्हें उनकी अगली लड़ाई की याद दिला रहा था

उसी तस्वीर में एक जवान आदमी दीवार से सर टिका

गुडगुडा रहा था हुक्का

एक बूढा वही बैठा बजा रहा था सारंगी


मुझे स्वीकार है तुम्हारा प्रणय निवेदन

बिना सात फेरों के बिना सातों वचन के!

बस एक वचन कि

जब मेरा बेटा कर रहा हो प्रणय निवेदन अपनी सहचरी से

तो उसके पीछे दीवार पर टंगी तस्वीर में

बूढ़ी औरत बजा रही हो सारंगी

बूढ़ा गुडगुडा रहा हो हुक्का

और जवान औरत और आदमी

मिल कर चला रहा हो चक्की

सुनो ! क्या तुम मेरे लिए,

बदल सकते हो दीवार पर टंगी इस तस्वीर के पात्रों की जगह भी?


Ghar Pe Thande Choolhe Par | Adam Gondvi
#1055
02/19/2026

घर पे ठंडे चूल्हे पर अगर ख़ाली पतीली है।अदम गोंडवी

घर पे ठंडे चूल्हे पर अगर ख़ाली पतीली है

बताओं कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है


भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सी

ये सुब्हे-फ़रवरी बीमार पत्नी से भी पीली है


बग़ावत के कँवल खिलते हैं दिल के सूखे दरिया में

मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली है


सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास हो कैसे

मुहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है


Pani Aur Dhoop | Subhadra Kumari Chauhan
#1054
02/18/2026

पानी और धूप । सुभद्राकुमारी चौहान


अभी अभी थी धूप, बरसने

लगा कहाँ से यह पानी

किसने फोड़ घड़े बादल के

की है इतनी शैतानी।


सूरज ने क्‍यों बंद कर लिया

अपने घर का दरवाजा़

उसकी माँ ने भी क्‍या उसको

बुला लिया कहकर आजा।


ज़ोर-ज़ोर से गरज रहे हैं

बादल हैं किसके काका

किसको डाँट रहे हैं, किसने

कहना नहीं सुना माँ का।


बिजली के आँगन में अम्‍माँ

चलती है कितनी तलवार

कैसी चमक रही है फिर भी

क्‍यों खाली जाते हैं वार।


क्‍या अब तक तलवार चलाना

माँ वे सीख नहीं पाए

इसीलिए क्‍या आज सीखने

आसमान पर हैं आए।


एक बार भी माँ यदि मुझको

बिजली के घर जाने दो

उसके बच्‍चों को तलवार

चलाना सिखला आने दो।


खुश होकर तब बिजली देगी

मुझे चमकती सी तलवार

तब माँ कर न कोई सकेगा

अपने ऊपर अत्‍याचार।


पुलिसमैन अपने काका को

फिर न पकड़ने आएँगे

देखेंगे तलवार दूर से ही

वे सब डर जाएँगे।


अगर चाहती हो माँ काका

जाएँ अब न जेलखाना

तो फिर बिजली के घर मुझको

तुम जल्‍दी से पहुँचाना।


काका जेल न जाएँगे अब

तूझे मँगा दूँगी तलवार

पर बिजली के घर जाने का

अब मत करना कभी विचार।



Is Janam Mein | Rajula Shah
#1053
02/17/2026

इस जनम में । राजुला शाह


अचरज हो तुम

एक दु:स्वप्न से जग

कमरे में

अलस्सुबह

परदे उड़ाते आती

हवा-सा अचरज।

इसके आगे मगर

मुझे कुछ याद नहीं


जगता हूँ तो स्वप्न भुला जाता है

सोता हूँ तो यह संसार

जाने कहाँ बिला जाता है

कभी यही भूल जाता हूँ

कि जागा हूँ या सो रहा


फिर भी

इस जनम में

तुमसे ही

बाकी सब

अपनी जगह पर है

इसलिए

मैं कहीं भी रहूँ

तुम यहीं रहना

मैं कुछ भी कहूँ

तुम यही कहना

मैं हूँ

मैं रहूँगी।



Jisko Bachpan Me Dekha | Madhav Kaushik
#1052
02/16/2026

जिसको बचपन में देखा । माधव कौशिक


जिसको बचपन में देखा वो पनघट पोखर ढूंढूंगा।

अगली बार गाँव में जाकर फिर अपना घर ढूंढूंगा।


ऐसा लगता है टाँगे ही टाँगे हैं अब लोगों की,

मुझको मौका मिला तो सबके कटे हुए सर ढूंढूंगा।


शहरों की शैतानी आँतें लीले गईं हर चीज़ मगर,

दिल की बच्चों जैसी ज़िद के तितली के पर ढूंढूंगा।


बुरे दिनों ने सिख लायी है जीने की तरकीब नई,

जो कुछ चौराहे पर खोया घर के अन्दर ढूंढूंगा।


तुम मेरे चेहरे पर लिखना इन्द्रधनुष उम्मीदों के,

मैं तेरी सूनी आँखों में नीला अम्बर ढूंढूंगा।


हो सकता है मुझे देखकर फिर छिप जाए जँगल में,

मैं अपनी खोई फितरत को भेस बदलकर ढूंढूंगा।


अगली बार गाँव में जाकर फिर अपना घर ढूंढूंगा।


Na Tha Kuch To Khuda Tha | Mirza Ghalib
#1051
02/15/2026

न था कुछ तो ख़ुदा था। मिर्ज़ा ग़ालिब


न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता


डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता

हुआ जब ग़म से यूँ बे-हिस तो ग़म क्या सर के कटने का


न होता गर जुदा तन से तो ज़ानू पर धरा होता

हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है


वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता



Bees Baras Baad | Satyam Tiwari
#1050
02/14/2026

बीस बरस बाद ।  सत्यम तिवारी 


जो जहाँ है वहाँ नहीं मिलेगा

मरीचिकाएं अब एक पुरानी सदा हैं 

और उठे हुए हाथ हवा में गिर जाते हैं

तय करना मुश्किल है ऐसे में मनुष्य की गति

शुरू ही होता है जिसका कालखंड

बीस बरस पूर्व


बर्फ़ के टुकड़े-सा चला है मेरा प्यार

और दूर है तुम्हारा हाथ इतना दूर 

वास्तुनिष्ठ सत्य जितना वास्तु से

चश्मा आँख से पानी का

कि हाथों हाथ लिया जाएगा फौरी सुझाव 

और साक्ष्यों के अभाव में मिलेगी माफ़ी

निर्देशक छूटे हुए दृश्य से पल्ला झाड़ेगा 

निर्माता अनाकर्षक किरदार पर डालेगा पर्दा


तीन बार दिन में लोटे से जल देगा

और रुकने के आग्रह पर चल देगा

देवता ऐसे आएगा कविता में

जैसे दुर्घटना का साक्ष्य छुपाने को बिल्ली

उलट दिशा में दौड़ेने लगेगा तुम्हारा अंतःकरण।



Kab Yaad Me Tera Saath Nahi | Faiz Ahmed Faiz
#1049
02/13/2026

कब याद में तेरा साथ नहीं । फ़ैज़ अहमद फ़ैज़


कब याद में तेरा साथ नहीं कब हाथ में तेरा हाथ नहीं


सद-शुक्र कि अपनी रातों में अब हिज्र की कोई रात नहीं

मुश्किल हैं अगर हालात वहाँ दिल बेच आएँ जाँ दे आएँ


दिल वालो कूचा-ए-जानाँ में क्या ऐसे भी हालात नहीं

जिस धज से कोई मक़्तल में गया वो शान सलामत रहती है


ये जान तो आनी जानी है इस जाँ की तो कोई बात नहीं

मैदान-ए-वफ़ा दरबार नहीं याँ नाम-ओ-नसब की पूछ कहाँ


आशिक़ तो किसी का नाम नहीं कुछ इश्क़ किसी की ज़ात नहीं

गर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है जो चाहो लगा दो डर कैसा


गर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाज़ी मात नहीं



Political And Physical Maps Of India | Priyankshi Mohan
#1048
02/12/2026

पॉलिटिकल एंड फिज़ीकल मैप्स ऑफ इंडिया।  प्रियंक्षी मोहन 


अखबार के पीछे से

भेदती हैं पिता की आँखें

एक समय के बाद

माँ के हाथ की बनी

गर्म, फूली हुई रोटियां भी

फफोले सी नज़र आती है

नकारेपन में इतना

घूम लिया है शहर कि

प्रेम करने के लिए तो

मिल जाता है एक कोना

मिल ही जाता है 

पर, "क्या करते हो बेटा?"

जैसे सवालों से छुपने के

लिए दूर दूर तक कोई

जगह नज़र नहीं आती है

"दरवाज़े बाई तरफ खुलेंगे"

हर रोज़  सुन सुनकर भी

पता नहीं चलता कि

आखिर जाना किस तरफ है

राशन की दुकान में

जैसे ताखों से झांकते हैं चूहे

उसी तरह बाप के दिलाए

हुए महंगे कपड़ों की खाली

जेबों से  बटुए झांकते है

भाइयों पर ज़िम्मा है

बहनों को ब्याहने का

और बहनों को

होने वाले पतियों की

बहनों का दहेज़ बनवाने का 

 

हम उलझे थे सदा

और उलझे ही रहेंगे

ऊन के गोलों की तरह

हम देश बदलने का

जज़्बा रखने वाले युवा

एक दिन दिखते ही देखते

पॉलिटिकल और फिज़ीकल

मैप्स ऑफ इंडिया में बदल ही जाते हैं



Sapne | Paash
#1047
02/11/2026

सपने । पाश

अनुवाद : चमनलाल


सपने

हर किसी को नहीं आते


बेजान बारूद के कणों में

सोई आग को सपने नहीं आते


बदी के लिए उठी हुई

हथेली के पसीने को सपने नहीं आते


शेल्फ़ों में पड़े

इतिहास-ग्रंथों को सपने नहीं आते


सपनों के लिए लाज़िमी है

झेलने वाले दिलों का होना


सपनों के लिए

नींद की नज़र होना लाज़िमी है


सपने इसलिए

हर किसी को नहीं आते


Garibi | Dhoomil
#1046
02/10/2026

ग़रीबी । धूमिल


ग़रीबी

एक ख़ुली हुई क़िताब

जो हर समझदार

और मूर्ख के हाथ में दे दी गई है।

कुछ उसे पढ़ते हैं

कुछ उसके चित्र देख

उलट-पुलट रख देते

नीचे ’शो-केस’ के।


Sadak | Dheeraj
#1045
02/09/2026

सड़क । धीरज 


तुम्हारा जाना,

मेरा ऐसे छूट जाना

जैसे हर साल छूट जाती है

गाँव की एक ख़राब सड़क

जिस पर लड़ा जा सके अगले साल का  चुनाव।



Pahadi Aurat | Nirmala Putul
#1044
02/08/2026

पहाड़ी औरत। निर्मला पुतुल 


वह जो सर पे सूखी लकड़ियों का गट्ठर लादे 

पहाड़ से उतर रही है 

पहाड़ी स्त्री 

अभी-अभी जाएगी बाज़ार 

और बेचकर सारी लकड़ियाँ 

बुझाएगी घर-भर के पेट की आग 


चादर में बच्चे को

पीठ पर लटकाये

धान रोपती पहाड़ी स्त्री

रोप रही है अपना पहाड़ सा दुख 

सुख की एक लहलहाती फसल के लिए 


पहाड़ तोड़ती, तोड़ रही है 

पहाड़ी बन्दिश और वर्जनाएं 


चटाईयाँ बुनते पहाड़ पर 

काट रही है पहाड़ सा दिन 


झाड़ू बनाती, बना रही है 

गंदगी से लड़ने के हथियार 

खोपा में खोसती फूल 

खोंस रही है किसी का दिल 

गाय-बकरियों के पीछे भागते 

उसके पाँव 

रच रहे हैं धरती पर 

सैकड़ों कुँवारे गीत।